आठ साल पहले पांच करोड़ तक के टर्नओवर वाली कंपनियों को कारपोरेट टैक्स में छूट दी गई थी। फर्मों को भी इसका लाभ मिलना चाहिए। इसके साथ सरकार कच्चे माल पर इंपोर्ट ड्यूटी और जीएसटी को भी कम करे। एमएसएमई के तहत बैंक उद्यमियों को कर्ज देने में राहत बरतें। अमर उजाला कार्यालय में शुक्रवार को बजट पूर्व आयोजित संवाद में शहर के उद्यमियों ने कुछ ऐसी उम्मीद जताई।
आसानी से मिले कर्ज
लघु उद्योग भारती के केशव प्रसाद माथुर का कहना है कि छोटी इंडस्ट्री के लिए बैंकों का ब्याज कम होना चाहिए। इसके अलावा कर्ज मिलने में आसानी हो। अफसर भी सिर्फ आंकड़े दुरुस्त करते रहते हैं, जमीन पर काम नहीं दिखता। सरकार सौ योजनाएं लाती है तो इनमें से 10 फीसदी ही लागू हो पाती हैं, लेकिन आंकड़ों में स्थिति ठीक दर्शायी जाती है।
सूक्ष्म उद्योगों के लिए अलग हो व्यवस्था
सरोजनीनगर औद्योगिक क्षेत्र के रितेश श्रीवास्तव का कहना है कि सूक्ष्म और मध्यम उद्योगों को दी जाने वाली सुविधाओं के मानक एक ही हैं। सूक्ष्म उद्योगों के लिए अलग से योजना की जरूरत है। कारोबार और निर्माण इकाइयों को मिला दिया गया है। इसे अलग करने की जरूरत है। मुद्रा योजना के 10 लाख तक के ऋण से कोई उद्योग नहीं लगाया जा सकता है।
कनेक्टिविटी बढ़े तो सुधरे होटल इंडस्ट्री
आईआईए के संजय सिंह का कहना है कि पर्यटन स्थलों की बेहतर कनेक्टिविटी बढ़े तो होटल इंडस्ट्री में सुधार हो सकता है। सरकार ने छह से 20 कमरों का होटल बनाने का आदेश तो जारी कर दिया, पर यह भी कह दिया कि विकसित कॉलोनियों में यह नियम लागू नहीं होगा। होटल हाईवे पर तो खुलेगा नहीं। इस पर विचार करने की जरूरत है।
समय से भुगतान नहीं, बैंक भी लेते हैं सर्विस चार्ज
आईआईए के सुरेंद्र तिवारी का कहना है कि सरकारी एजेंसी से साल बीतने के बावजूद भुगतान नहीं आता। इस पर एमएसएमई को 27 प्रतिशत ब्याज मिलना चाहिए। उसमें नियम है कि जब कोर्ट कहेगा तब होगा, पर ऐसा नहीं होना चाहिए। बैंकों का सर्विस चार्ज भी खत्म करना चाहिए। छोटे उद्योगों को कम ब्याज पर ऋण मिलना चाहिए।
छोटे उद्योगों को पुनर्जीवन देने की जरूरत
तालकटोरा औद्योगिक क्षेत्र के दीपक विरमानी का कहना है कि तालकटोरा औद्योगिक एसोसिएशन में 140 सदस्य है। इनमें सबसे ज्यादा सूक्ष्म उद्योगों से जुड़े हैं। 10-15 साल में कई फैक्टरियां बंद हो चुकी हैं। ऐसे में छोटे उद्योगों को पुनर्जीवन देने की जरूरत है। सूक्ष्म उद्योगों के लिए जीएसटी बड़ी मुश्किल है।
राशन की पैकिंग से जीएसटी हटे, सीमेंट पर कम हो
एसोचैम के प्रमोद कुमार वैश्य का कहना है कि सरकार गरीबों को मुफ्त राशन दे रही है तो दूसरी तरफ दाल, चावल और आटे की पैकिंग पर पांच प्रतिशत जीएसटी वसूल रही है। इसे खत्म करना चाहिए। सीमेंट पर जीएसटी 28 से कम करके 18 प्रतिशत किया जाना चाहिए। होम लोन में ब्याज की छूट को नई रिजीम में शामिल करना चाहिए।
टैक्स स्लैब कम हो बढ़ जाएगा राजस्व
एसोचैम के दिनेश गोस्वामी का कहना है कि सरकार करों की स्लैब कम करे तो राजस्व बढ़ेगा। हम उत्पादों पर 18 प्रतिशत जीएसटी दे रहे हैं, पर उतना कमा नहीं पा रहे। कच्चे माल और फिर उससे बने नए उत्पाद पर भी अलग-अलग जीएसटी है। सरकार इतनी योजनाएं लेकर आई, लेकिन जमीन पर लागू कुछ नहीं कर पा रही है।
टैक्स सरलीकरण जरूरी
सीआईआई के आशीष कपूर का कहना है कि एमएसएमई में 45 दिन में भुगतान की बात कही गई, पर ऐसा नहीं होता। इसके शासनादेश को लेकर होना चाहिए कि खरीदार को 45 दिन में नहीं तो जब इंडस्ट्री अपना आयकर रिटर्न भरे, तो उस वक्त तक भुगतान होना चाहिए। टैक्स का सरलीकरण कर सरकार को पुरानी और नई व्यवस्था में से एक व्यवस्था को ही लागू करना चाहिए।
चिकित्सा क्षेत्र में प्राइवेट शेयर बढ़ाना चाहिए
सीआईआई के सम्राट मारवाह का कहना है कि हेल्थकेयर इंडस्ट्री में बाहर से आ रहे उपकरणों में 18 और 10 प्रतिशत जीएसटी देनी पड़ रही है। पांच प्रतिशत से ज्यादा जीएसटी नहीं होनी चाहिए। जन आरोग्य में गंभीर बीमारियों का कवरेज नहीं है। सरकारी अस्पताल में जहां संसाधन नहीं हैं, वहां प्राइवेट हेल्थकेयर सेक्टर को सौंपने का निर्णय लेना चाहिए।
बचत थोपें नहीं, कर व्यवस्था पर विचार जरूरी
अमौसी इंडस्ट्रियल एरिया के रजत मेहरा का कहना है कि आठ साल पहले पांच करोड़ तक के टर्नओवर वाली कंपनियों को कारपोरेट टैक्स में छूट दी गई थी। यह सहूलियत सिर्फ कंपनियों को मिल रही है, जबकि फर्मों की संख्या ज्यादा है। पिछले पांच साल में कई निर्माण इकाइयां बंद हुईं। इन्हें मजबूत करने के लिए ऋण आदि व्यवस्थाओं को आसान करना होगा।
बचत को बढ़ावा दें, 80 सी की सीमा बढ़े
सीआईआई के राघव कृष्णा का कहना है कि कर छूट के प्रावधान में 80 सी के तहत 1.5 लाख रुपये की सीमा तय है, इसे 2.5 लाख कर देना चाहिए। बच्चों के लिए दिए जाने वाले भत्ते की सीमा भी 100 रुपये है। आज के समय में जब फीस व अन्य खर्च इतने बढ़ चुके हैं तो इसमें भी संशोधन जरूरी है।
कंपनी और फर्म का अंतर
कंपनी कारपोरेट मंत्रालय में पंजीकृत होती हैं। फर्म का रजिस्ट्रेशन रजिस्ट्रार या फिर इनकम टैक्स नियम के तहत होता है।