श्रीराम जन्मभूमि के संपूर्ण 70 एकड़ परिसर के विस्तार की संभावना जताई जा रही है। इसके पीछे बड़ा कारण रामजन्मभूमि परिसर का चौरस (वर्गाकार) न होना बताया जा रहा है। राममंदिर बनने से पहले चारों तरफ परकोटा का निर्माण किया जाना चाहिए। वास्तु की दृष्टि से किसी भी मंदिर का परिसर या परकोटा चौरस होना चाहिए। ऐसे में रामजन्मभूमि परिसर को चौरस बनाने में ईशानकोण व पश्चिम दिशा में बाधाएं आ रहीं हैं। पश्चिम दिशा में नजूल की भूमि व मुस्लिम आबादी है। इसको देखते हुए ट्रस्ट नजूल की भूमि को परिसर के अंतर्गत मिलाने के लिए प्रशासन से वार्ता करने की तैयारी कर रहा है।
बुधवार को कारसेवकपुरम में हुए संत सम्मेलन में रामनगरी के संतों को मंदिर निर्माण की प्रगति से अवगत कराते हुए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने कहा कि राममंदिर का परकोटा वर्गाकार नहीं बन पा रहा है क्योंकि रामजन्मभूमि परिसर ही चौरस नहीं है। पश्चिम एवं उत्तर-पूरब दिशा में चुनौती खड़ी हो रही है। वास्तु शास्त्र में ईशानकोण का महत्व है वहां फकीरे राम मंदिर आ रहा है। पश्चिम दिशा में नजूल व मुस्लिमों की जमीन है।
उन्होंने कहा कि चूंकि किसी भी मंदिर परिसर का वास्तु शास्त्र की दृष्टि से वर्गाकार होना जरूरी है। इसलिए इस समस्या का समाधान करना भी जरूरी है। पश्चिम दिशा में नजूल की भूमि है, जिसको लेकर प्रशासन से वार्ता की जाएगी, ताकि पश्चिम दिशा की बाधा समाप्त हो जाए। वहीं दूसरी तरफ ईशानकोण में स्थित फकीरे राम मंदिर के अधिग्रहण को लेकर भी चर्चा है, लेकिन इस संबंध में ट्रस्ट के किसी भी पदाधिकारी ने पुष्टि नहीं की है। चर्चा है कि ट्रस्ट के पदाधिकारी सहमति के आधार पर फकीरे राम मंदिर को अधिग्रहीत करने के लिए मंदिर के महंत से चर्चा कर रहे हैं। चर्चा सकारात्मक दिशा में पहुंच गई है।
पांच प्रमुख वास्तुशास्त्रियों की समिति तय करेगी मंदिर का वास्तुशास्त्र
राममंदिर का निर्माण वैदिक रीति-रिवाज से किया जाएगा। वास्तुशास्त्र की दृष्टि से कोई खामी न रह जाए, इसका भी ध्यान रखा जा रहा है। इसके लिए पांच प्रमुख वास्तुशास्त्रियों की समिति भी बनाई गई है। जिसमें जय गोपाल, जी सुब्रह्मण्यम भट्ट उडुपी, कृष्णा राजतंत्र बंगलुरु सहित दिल्ली व काशी के वास्तुशास्त्री रखे गए हैं। मंदिर शिल्पशास्त्र को दिमाग में रखकर बनाया जाएगा। समिति ने ही यह सुझाव दिया है कि पहले वास्तु शास्त्र की दृष्टि से रामजन्मभूमि परिसर का चौरस होना आवश्यक है, जिसके बाद परिसर को वर्गाकार बनाने की योजना बन रही है।
वास्तुशास्त्र के अनुसार शुभ नहीं होते अनियमित आकार के मंदिर
मंदिर निर्माण में वास्तु का बहुत ध्यान रखा जाता है। यदि हम भारत के प्राचीन मंदिरों पर नजर डालें तो पता चलता है कि सभी का वास्तुशिल्प बहुत सुदृढ़ था। मंदिर पिरामिडनुमा और पूर्व, उत्तर या ईशानमुखी होता है। मंदिर के मुख्यत: उत्तर या ईशानमुखी होने के पीछे कारण यह कि ईशान से आने वाली ऊर्जा का प्रभाव ध्यान-प्रार्थना के लिए अति उत्तम माहौल निर्मित करता है। जहां मंदिर का निर्माण करना हो उस भूमि का आकार वर्गाकार या आयताकार होना चाहिए। अनियमित आकार नहीं होना चाहिए।
भूमि की दिशाएं ध्रुव तारे की सीध में हों अर्थात भूमि की चारों दिशाएं समानांतर हों, कोने में न हों। गर्भ गृह के अंदर घंटा, लाउडस्पीकर इत्यादि भी नहीं लगाना चाहिए। मंदिर के पूर्व में रोशनदान होना शुभ होता है जहां से सुबह सूर्य की किरणें मूर्ति पर बिना किसी रुकावट के पड़े। मंदिर की परिक्रमा करने के लिए पर्याप्त स्थान छोड़ना चाहिए ताकि भक्तों को मंदिर की परिक्रमा करने में कोई असुविधा न हो। दक्षिण या पश्चिम दिशा में स्थित गर्भ गृह वाले मंदिर के गर्भ गृह की तुलना में मंदिर प्रांगण के अन्य सभी की छत की ऊंचाई कम होनी चाहिए।
दीप स्तंभ, अग्नि कुंड, यज्ञ कुंड इत्यादि आग्नेय कोण में होने चाहिए। प्रसाद, लंगर, भंडारा इत्यादि बनाने के लिए रसोईघर की व्यवस्था मंदिर प्रांगण के आग्नेय कोण में करनी चाहिए। प्रसाद वितरण का कार्य मंदिर के ईशान कोण में होना चाहिए। मंदिर की दान पेटी उत्तर दिशा में इस प्रकार रखनी चाहिए कि वह उत्तर दिशा की ओर ही खुले। मंदिर के चारों ओर प्रवेश द्वार होना शुभ माना जाता है। प्रमुख प्रवेश द्वार अन्य द्वारों से ऊंचा, बड़ा एवं सुंदर बनाना चाहिए। किसी भी प्रवेश द्वार के सामने किसी प्रकार का भेद नहीं होना चाहिए।