मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजों ने उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
इन दलों को अब लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा।
ऐसी दलीलें तलाशनी होंगी जिनसे लोग इन पर भरोसा कर सकें। यूपी में भाजपा की भी राह आसान नहीं है।
सूबे की 80 संसदीय सीटों में से ज्यादातर पर काबिज होने के लिए कड़ी मशक्कत करनी होगी।
लोकसभा चुनाव के सेमीफाइनल माने जा रहे इन चुनावों में यूपी मूल की पार्टियों सपा-बसपा ने मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ या दिल्ली में अपनी कोई बड़ी भूमिका का दावा तो नहीं किया था।
लेकिन नरेन्द्र मोदी की हवा और पकड़ को खारिज करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। पर, नतीजे आए तो इन दलों के दावे ही हवा में उड़ते दिखे। कांग्रेस की भी यही दशा रही।
करनी होगी नए सिरे से तैयारी
सपा, बसपा और कांग्रेस ने मोदी की हवा व भाजपा की बढ़त के दावों को न सिर्फ खारिज किया बल्कि चुनाव पूर्व अनुमानों में भाजपा की बढ़त को भी मानने से इन्कार किया।
पर, अब जो परिदृश्य सामने आया है उसके बाद किसी के पास पुराने दावे दोहराने का कोई आधार ही नहीं बचा।
रही बात उत्तर प्रदेश की तो इन नतीजों से उन लोगों में भी भाजपा की पहुंच आसान हो गई है जो भाजपा व मोदी के दावों पर भरोसा नहीं कर रहे थे। ऐसे लोगों में मोदी व भाजपा के लिए आकर्षण बढ़ा तो सपा, बसपा और कांग्रेस की मुसीबतें भी बढ़ेंगी।
सबक भी हैं नतीजे
भले ही सपा- बसपा का इन राज्यों में बहुत दखल न रहा हो लेकिन नतीजों ने यह तो साफ कर ही दिया है कि कांग्रेस की रीति-नीति से लोगों में नाराजगी है।
सपा और बसपा दोनों केंद्र में जिस तरह कांग्रेस सरकार के समर्थन में खड़े रहे हैं, अब उन्हें अपनी भूमिका पर फिर से विचार करना होगा।
अब इनका वह तर्क नहीं चलेगा कि उन्होंने सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए कांग्रेस का साथ दिया है।
देखने वाली बात यह होगी कि कांग्रेस के खिलाफ मुखर हुई जनता की नाराजगी के बावजूद ये दल उसके साथ खड़े रहते हैं या नई राह तलाशते हैं। कोई भी फैसला उप्र के सियासी समीकरणों पर प्रभाव डाले बिना नहीं रहेगा।
भगवा मंडली को भी करनी होगी समीक्षा
नतीजों ने मोदी और भाजपा को मनोवैज्ञानिक बढ़त जरूर दी है लेकिन यूपी में हालात थोड़े जुदा हैं। न सिर्फ खस्ताहाल संगठन को चुस्त-दुरुस्त करना होगा बल्कि पक्ष में बने माहौल को वोटों में तब्दील करने के उपाय भी तलाशने होंगे। दरअसल, चुनाव वाले चार राज्यों व उप्र की स्थिति में अंतर है।
राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई थी। जनता को दो के बीच एक को चुनना था। पर, जिस तरह दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ‘आप’ ने पूरी लड़ाई को त्रिकोणात्मक बनाते हुए कांग्रेस का सफाया किया उससे भाजपा की राह कुछ मुश्किल बन गई है।
इसे देखते हुए उप्र में भगवा मंडली को कांग्रेस से मुकाबला करने के बारे में भी सोचना होगा और सपा व बसपा जैसे क्षेत्रीय दलों की जातीय गोलबंदी को निष्प्रभावी बनाने के बारे में भी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अभी से उसी तरह एक-एक सीट पर नजर टिकानी होगी, जिस तरह उसने बाकी के राज्यों में परदे के पीछे से काम किया है।
कांग्रेस कैसे पाएगी पार
वर्ष 2009 में उत्तर प्रदेश के नतीजों में राहुल गांधी की करिश्माई भूमिका का गुणगान करने वाले कांग्रेसियों को यहां राहुल के लिए नई भूमिका गढ़नी होगी।
इसे ध्यान में रखते हुए कि राहुल को उप्र में लोकसभा चुनाव के दौरान उन्हीं मोदी से दो-दो हाथ करना है जिन्होंने चार राज्यों में उनके करिश्मे को नहीं चलने दिया।
ऐसे में कांग्रेस के रणनीतिकारों को राहुल को नए हथियारों से लैस करके यहां उतारना होगा। पर, यह काम बहुत आसान नहीं है।
लोकसभा चुनाव अगर साल-दो साल बाद होते तो यह मान लिया जाता कि लोग तब तक इन नतीजों के प्रभाव से मुक्त हो जाएंगे। पर, चुनाव में मुश्किल से तीन -चार महीने ही बचे हैं।
इसलिए राहुल के लिए उत्तर प्रदेश के लोगों में कांग्रेस के प्रति भरोसा जगाना बहुत आसान नहीं है। भले ही कांग्रेस के नेता चाहे जो तर्क दे रहे हों।