लखनऊ साहित्य महोत्सव में शबाना अाजमी।
- फोटो : amar ujala
मशहूर फिल्म अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आजमी ने कहा है कि जब भी कोई नई सरकार आती है, अल्पसंख्यकों के लिए सही-गलत की परिभाषाएं की तय की जाने लगती हैं।
समान नागरिक संहिता की बात केवल चुनावी सभाओं तक सीमित रह जाती है। इसे लैंगिक समानता पर भी आधारित होना चाहिए। शबाना रविवार को लखनऊ साहित्य महोत्सव के तीसरे और आखिरी दिन ‘भारतीय नारीवाद’पर बोल रही थीं।
उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता लाने के पहले अल्पसंख्यकों को समानता के स्तर पर लाना होगा। जो लोग समान नागरिक संहिता की वकालत करते हैं उन्हें ऐसे कानून का खाका तैयार करना चाहिए जो पुरुषों और स्त्रियों के लिए समान हो।
चर्चा में मेजर जनरल विभा दत्ता और पूर्व अपर महाधिवक्ता बुलबुल गोदियाल के अलावा अवनी बंसल और उपिन्दर सिंह ने भी हिस्सा लिया।
सवालों के जवाब में शबाना ने कहा कि दहेज प्रतिषेध अधिनियम के दुरुपयोग की बात गलत तरीके से उठाई जाती रही है जबकि इसका प्रतिशत बहुत ही कम है। बहुत कम महिलाएं हैं जिन्हें इनका लाभ मिला है।
तीन तलाक मानवता के खिलाफ
लखनऊ साहित्य महोत्सव में शबाना अाजमी।
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शबाना ने कहा कि महिलाओं का आरक्षण अत्यंत आवश्यक है। संसद में यह लागू हुआ तो महिलाओं को अपनी बात रखने के अधिक अवसर मिल सकेंगे। पंचायती राज में महिलाओं के आने से बदलाव दिखा है। तीन तलाक की चर्चा करते हुए शबाना ने कहा कि यह अन्यायपूर्ण और गलत है। यह मानवता के खिलाफ है।
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे...
शबाना ने श्रोताओं की मांग पर अपने पिता और प्रसिद्ध शायर कैफी आजमी की प्रसिद्ध नज्म ‘औरत’भी सुनाई। उन्होंने सुनाया-कद्र अब तक तेरी तारीख ने जानी ही नहीं, तुझमें शोले भी हैं बस अश्क-फिशानी ही नहीं, तू हकीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं, तेरी हस्ती भी है इक चीज जवानी ही नहीं, अपनी तारीख का उनवान बदलना है तुझे, उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे...।