मिजोरम को छोड़कर शेष चार राज्यों पर उत्तर प्रदेश की निगाहें भी लगी हुई हैं।
कारण, इन राज्यों के नतीजे न सिर्फ अपने प्रदेश में सियासी दलों का भविष्य तय करेंगे, बल्कि यूपी के राजनीतिक दलों व नेताओं के लिए भी आईना बनेंगे।
इस आईने में सपा और बसपा का भविष्य दिखेगा तो भाजपा व कांग्रेस की दिशा और दशा की हकीकत भी उजागर होगी।
राष्ट्रीय स्तर पर दो प्रमुख चेहरों नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी की पकड़ व पहुंच के बारे में भी ये नतीजे काफी कुछ हकीकत लोगों के सामने ला देंगे।
वजह यह है कि मुलायम सिंह यादव और मायावती की राजनीतिक ताकत की मुख्य पूंजी उत्तर प्रदेश ही है। इसी पूंजी के दम पर दोनों नेता लोकसभा चुनाव के बाद राष्ट्रीय राजनीति में अपनी-अपनी प्रमुख भूमिका की दावेदारी कर रहे हैं।
मुलायम के सपने की भी परीक्षा
मुलायम जहां लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद केंद्र में तीसरे मोर्चे की सरकार बनने की दावेदारी कर रहे हैं, वहीं उनका दावा तीसरे मोर्चे की सरकार में प्रधानमंत्री पद के लिए भी है। अपने दावों को पुख्ता आधार देने और सपा को राष्ट्रीय दल के रूप में स्थापित करने की मंशा से उन्होंने इन सभी राज्यों में उम्मीदवार उतारे हैं।
भले ही छत्तीसगढ़ और दिल्ली में औपचारिकता निभाने भर के लिए ऐसा किया गया हो, लेकिन मध्यप्रदेश व राजस्थान में अपनी जगह मजबूत बनाने के लिए सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सभाएं भी की हैं।
मुलायम ही नहीं, मायावती के दावे भी दांव पर : सिर्फ मुलायम सिंह यादव ही नहीं, बल्कि बसपा प्रमुख मायावती के बारे में भी ये नतीजे काफी कुछ व्याख्या करने वाले हैं।
खास तौर से इस बात की कि लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में ‘सत्ता-संतुलन’ में मुख्य किरदार निभाने का उनका दावा लोगों को कितना प्रभावित कर पा रहा है?
यह भी पता चलेगा कि यूपी जैसे बड़े राज्य की सियासत के प्रमुख किरदार दोनों दल दूसरे राज्यों में कोई खास जगह बना पाए हैं या हाल 2008 जैसा ही है।
यही नहीं, दोनों दलों की केंद्र में भूमिका पर लोगों की पसंदगी या नापसंदगी भी इन नतीजों के साथ सामने आएगी कि लोगों ने केंद्र सरकार को इनके समर्थन को पसंद किया है या नहीं।
राहुल व मोदी के प्रचार को मिलेगी ताकत
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुुल गांधी ने इन चुनावों को लोकसभा चुनाव के सेमी फाइनल मैच की तरह लिया है। इसलिए इन राज्यों के नतीजे उत्तर प्रदेश में इन दोनों नेताओं के लोकसभा चुनाव अभियान को भी प्रभावित करेंगे।
भाजपा की सीटें और मत प्रतिशत बढ़ा तो भाजपाइयों को यह दावा करने का पुख्ता आधार मिल जाएगा कि दूसरे राज्यों में भी मोदी ने अपनी लोकप्रियता साबित कर दी है।
इसलिए अगर उत्तर प्रदेश ने साथ दे दिया तो केंद्र से कांग्रेस सरकार की विदाई तय हो जाएगी। मोदी को भी उत्तर प्रदेश में अपने चुनावी अभियान के लिए मनोवैज्ञानिक ताकत मिलेगी।
राहुल पा सकते हैं आधार
वहीं, कांग्रेस के पक्ष में नतीजे ठीक-ठाक रहे तो कांग्रेसियों को यूपी के लोगों में राहुल गांधी में दम का दावा करने का आधार मिल जाएगा। खुद राहुल गांधी यह दावा कर सकेंगे कि जनता ने कांग्रेस को एक और मौका देने का मन बना लिया है।