यूपी विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद मुलायम सिंह के कुनबे में सुलह की कोशिशें तेज हो गई है। सपा विधायक दल की बैठक में शिवपाल सिंह यादव के पहुंचने से इसके संकेत मिलने शुरू हो गए हैं।
लंबे समय बाद अखिलेश यादव और शिवपाल मंच पर साथ-साथ बैठे। उन्होंने एक-दूसरे के खिलाफ इशारों में भी हमला नहीं किया।
सपा के कुनबे में चार महीने चली रार इस साल के पहले दिन चरम पर पहुंच गई थी, जब सपा के विशेष अधिवेशन में मुलायम सिंह को हटाकर अखिलेश यादव को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया।
शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने से चार दिन पहले सपा के इस घटनाक्रम का चुनाव पर भी असर पड़ा।
परिवार के कई सदस्य हार गए चुनाव
मुलायम सिंह यादव
मुलायम सिंह जसवंतनगर (इटावा), लखनऊ कैंट और मल्हनी (जौनपुर) के अलावा किसी सीट पर चुनाव प्रचार के लिए नहीं गए। शिवपाल भी जसंवतनगर सीट तक ही सीमित रहे।
सपा के लिए चुनावी नतीजे निराशाजनक रहे। मुलायम की पुत्रवधू अपर्णा, भतीजे अनुराग यादव भी चुनाव हार गए। अब कुनबे की रार थामने के लिए मुलायम आगे आए हैं। उनके कहने पर ही शिवपाल ने विधायक दल की बैठक में हिस्सा लिया।
मुलायम चाहते हैं कि परिवार के विवाद को खत्म कर पार्टी को एक बार फिर आगे बढ़ाया जाए। इसलिए उन्होंने हार के बाद भी अखिलेश के प्रति लचीला रुख अपनाया। हालांकि वह शिवपाल को पार्टी में सम्मान दिए जाने के पक्षधर हैं।
अखिलेश के नजदीकी आजम को देना चाहते हैं जिम्मेदारी
सपा का एक खेमा चाहता है कि विधायक दल का नेता बनाकर शिवपाल को सम्मान दिया जा सकता है। मुख्य विपक्षी पार्टी होने के नाते सपा विधायक दल का नेता ही विपक्ष का नेता होगा।
इससे परिवार का विवाद भी थम सकता है, लेकिन अखिलेश के नजदीकी लोग इस पद पर रामगोविंद चौधरी या आजम खां को देखना चाहते हैं। पलड़ा रामगोविंद चौधरी का भारी माना जा रहा है। वह अखिलेश यादव के नजदीकी समझे जाते हैं।
सपा विधायक दल का नेता पद तय करेगा कि परिवार की रार थमेगी या और बढ़ेगी। इस मुद्दे पर खींचतान भी बढ़ सकती है। यह भी संभव है कि परिवार के विवाद को खत्म करने के लिए मुलायम सिंह कोई नया फार्मूला पेश करें।