- पांच साल में एक बार 20 से 25 प्रतिशत की वेतनवृद्धि दी जाती है, इस बार सिर्फ दो प्रतिशत दी गई।
- केंद्रीय कर्मचारी के मुकाबले बैंककर्मियों को करीब 40 प्रतिशत न्यूनतम बेसिक वेतन मिलता है।
- नोटबंदी और नए नोट जारी करने में 10 से 12 घंटे रोज के बदले ओवर टाइम नहीं दिया गया।
- कर्मियों व अफसरों को म्यूचुअल फंड व इंश्योरेंस बेचने के लक्ष्य से निजी कंपनियों को हो रहा फायदा।
- राजनीतिक दबाव से जनता के रुपये में से बड़े उद्यमियों को दिलवाया जा रहा ऋण, पर नहीं लौटा रहे उद्यमी।
- कार्यक्षमता बढ़ाने का तर्क देकर छोटे सरकारी बैंकों का किया जा विलय, पर निजी बैंकों को दे रहे लाइसेंस।
‘उद्योगों को हजारों करोड़ देकर डुबोए ’
बैंककर्मियों ने केंद्र सरकार और इंडियन बैंक एसोसिएशन (आईबीए) के खिलाफ जमकर भड़ास निकाली। यूएफबीयू के प्रदेश संयोजक वाईके अरोड़ा ने कहा कि वर्षों की मेहनत के बाद वेतन में मात्र दो प्रतिशत की वृद्धि अन्याय है। इस हड़ताल से उन्हें दो दिन का वेतन तक कटवाना पड़ सकता है।
वहीं नेशनल कंफेडरेशन ऑफ बैंक यूनियंस के महामंत्री केके सिंह ने कहा कि आईबीए ने डूबे ऋण को घाटे की वजह बताया है और इसी आधार पर कम वेतन वृद्धि दी जा रही है। हजरतगंज स्थित एसबीआई के मुख्य द्वार पर प्रदर्शन किया गया। इस दौरान बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के महासचिव दिलीप चौहान, स्टेट बैंक अधिकारी संघ महामंत्री पवन कुमार, नेशनल कंफेडरेशन ऑफ बैंक यूनियन उपाध्यक्ष वीके सेंगर, एसके संगतानी, एसडी मिश्र, डीपी वर्मा, सहित कई नेताओं ने सभा को संबोधित किया।