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राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष : इलाज करवाने में भी बेटियों से भेदभाव, जरूरत पड़ने पर भी नहीं कराते बच्चियों को भर्ती

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प्रतीकात्म चित्र। - फोटो : google
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चंद्रभान यादव
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लखनऊ। बेटियों के हर क्षेत्र में परचम लहराने पर भी बेटा-बेटी का भेद खत्म नहीं हुआ है। इसका प्रमाण राजधानी के चिकित्सा संस्थानों की न्यूनेटल इन्टेन्सिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) भी दे रही हैं। सरकारी अस्पतालों की एनआईसीयू में भर्ती होने वालों में बच्चियां औसतन 40 फीसदी होती हैं तो निजी अस्पतालों में यह आंकड़ा 25 फीसदी ही है। इससे एकबारगी यह लगता है कि बेटियां कम बीमार होती हैं, लेकिन ऐसा है नहीं। डॉक्टरों का कहना है कि जरूरत होने पर भी अभिभावक इन्हें भर्ती नहीं कराते और बहाने बनाते हैं।
‘अमर उजाला’ ने पड़ताल की तो नतीजे चौंकाने वाले मिले। केजीएमयू की एनआईसीयू में वर्ष 2019 में 2578 नवजात भर्ती हुए, जिनमें बालिकाओं की संख्या 38.7 और बालकों की 61.2 फीसदी रही। वर्ष 2020 में दिसंबर तक 1988 नवजात भर्ती हुए। इसमें 41.8 फीसदी बालिकाएं व 58.19 प्रतिशत बालक रहे। कमोबेश यही स्थिति एसजीपीजीआई की एनआईसीयू की रही। यहां सालभर में भर्ती नवजात में बालिकाएं 35 फीसदी ही रहीं।
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यूनिसेफ ने प्रदेशभर की स्पेशल न्यू बॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) रिपोर्ट का मूल्यांकन किया तो वर्ष 2019 में भर्ती बालिकाओं की संख्या 37.82 फीसदी रही। 2020 में यह आंकड़ा 37.48 प्रतिशत रहा। राजधानी के तीन अस्पतालों की एनआईसीयू का विवरण लिया तो इनमें भर्ती नवजात में बालिकाओं की संख्या 25 फीसदी मिली। केजीएमयू, एसजीपीजीआई की एनआईसीयू में पहुंचने वाली बालिकाएं राजधानी व अन्य जिलों से आती हैं। हालांकि, छोटे शहरों से बच्चियां यहां तक नहीं लाई जाती हैं। इसके पीछे सामाजिक सोच व बालिकाओं पर पैसा खर्च न करने की प्रवृति को माना जाता है।
निजी अस्पतालों में खर्च ज्यादा, इसलिए नहीं ले जाते
जन्म लेने के बाद जिन बच्चों की स्थिति गंभीर हो जाती है, उन्हें एनआईसीयू में भर्ती करना पड़ता है। सरकारी संस्थानों में अब जननी सुरक्षा योजना के तहत इलाज की सुविधा है। ऐसे में एनआईसीयू में भर्ती होने वाले नवजात पर करीब दो हजार रुपये प्रतिदिन का खर्च आता है। प्राइवेट अस्पतालों में यह खर्च करीब 10 से 15 हजार रुपये रोजाना आता है। इस कारण इनमें बच्चियों को नहीं ले जाते।
बालिकाओं को छोड़कर भाग जाते हैं परिवारीजन
केजीएमयू की एनआईसीयू में कई बार भर्ती बालिकाओं के परिवारीजन दो-तीन दिन बाद उन्हें छोड़ कर भाग जाते हैं। ऐसे में इनके इलाज का खर्च यूनिवर्सिटी उठाती है। यदि नवजात की मौत हो गई तो पुलिस को सूचना देकर अंतिम संस्कार करा दिया जाता है। पिछले साल ऐसी दो घटनाएं हो चुकी हैं।
महिलाएं आत्मनिर्भर बनें तो खत्म हो समस्या
केजीएमयू की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शालिनी त्रिपाठी कहती हैं कि बालक-बालिका के इलाज में भेदभाव का दायरा कम हो रहा है, लेकिन इसकी गति काफी धीमी है। कई लोग तो ऐसे होते हैं, जो बालिकाओं के लिए जरूरी दवाएं तक लाने में परहेज करते हैं। इसके पीछे अशिक्षा व संकीर्ण सोच है। जब तक महिलाएं उच्च शिक्षा हासिल कर आत्मनिर्भर नहीं बनेंगी, तब तक ऐसी सोच बदल पाना मुश्किल होगा।
ओपीडी में भी दिखता है भेदभाव
एसजीपीजीआई की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. पियाली भट्टाचार्य कहती हैं कि ओपीडी में भी बालिकाओं की अनदेखी दिखती है। कई बार संस्थान तक बालिकाएं पहुंच जाती हैं, लेकिन परिवारीजन जांच कराने व दवा खरीदने से परहेज करते हैं। फॉलोअप में आने पर वजह पूछो तो बहाने बनाते हैं। बार-बार काउंसलिंग पर भी बेटियों के इलाज के प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखती है। तमाम ऐसे अभिभावक आते हैं, जो बेटे की जान बचाने को सबकुछ करने को तैयार रहते हैं, लेकिन बेटी की बीमारी को गंभीरता से नहीं लेते। इसके लिए सामाजिक आंदोलन की जरूरत है।
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सामाजिक सहभागिता से बदलेगी सोच
यूनिसेफ की स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. कनुप्रिया सिंघल कहती हैं कि ग्लोबल आंकड़ों की अपेक्षा भारत में बालिकाओं की मृत्युदर अधिक है। इसकी मूल वजह इनके इलाज को लेकर गंभीर नहीं होना है। जागरूकता के प्रयासों के बावजूद अभी बालिकाओं को कमतर ही आंका जाता है। यही वजह है कि एसएनसीयू में 37 फीसदी ही बालिकाएं भर्ती हो पाती हैं। सभी को मिलकर बच्चियों के इलाज के प्रति लोगों को जागरूक करना होगा।
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