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Lucknow News: कंधे के हर दर्द को फ्रोजन शोल्डर न मानें, हो सकता है रोटेटर कफ टियर

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प्रतीकात्मक फोटो।
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लखनऊ। रात में कंधे में तेज दर्द, हाथ उठाने में दिक्कत और चोट के बाद कमजोरी को केवल फ्रोजन शोल्डर समझना सेहत के लिए भारी पड़ सकता है। यह लक्षण रोटेटर कफ टियर यानी हड्डी से चिपकी मांसपेशियों के क्षतिग्रस्त होने के भी हो सकते हैं। गलत इलाज और बिना जांच के लगातार व्यायाम करने से कंधे की चोट बढ़ सकती है।
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केजीएमयू हड्डी रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. आशीष कुमार ने शनिवार को केजीएमयू के हड्डी रोग विभाग की ओर से एक होटल में आर्थ्रोस्कोपी पर हुई कार्यशाला में ये जानकारी दी। डॉ. आशीष कुमार ने बताया कि ऑर्थोपेडिक्स ओपीडी में रोटेटर कफ टियर के हर दिन पांच से छह मरीज आते हैं। इनमें करीब 90 फीसदी मरीज तब पहुंचते हैं, जब परेशानी काफी बढ़ चुकी होती है। कई मरीज पहले फिजियोथेरेपिस्ट या झोलाछाप से इलाज कराते हैं, जिससे इलाज का परिणाम बेहतर नहीं रहता। आर्थ्रोस्कोपिक रिपेयर के बाद भी करीब 25 फीसदी मरीजों को दोबारा सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है।
मधुमेह रोगियों में फ्रोजन शोल्डर की समस्या अधिक
दिल्ली से आए डॉ. दीपक चतुर्वेदी ने बताया कि डायबिटीज के मरीजों में फ्रोजन शोल्डर की समस्या अधिक होती है। डायबिटीज के कारण कंधे के जोड़ के आसपास की कोशिकाएं मोटी और सख्त हो जाती हैं। गैर-डायबिटीज मरीजों में ऐसे लक्षण होने पर रोटेटर कफ टियर की जांच करानी चाहिए। दूरबीन विधि से ऑपरेशन कर पैच ऑगमेंटेशन का प्रत्यारोपण किया जा सकता है, जिससे चोट जल्द ठीक होती है। डॉ. मयंक महेंद्र ने कहा कि फ्रोजन शोल्डर में ऊतक सख्त होने से जोड़ की गतिविधियां सीमित होती हैं, जबकि रोटेटर कफ टियर में मांसपेशियों और टेंडन में चोट आती है। दोनों के लक्षण मिलते-जुलते हो सकते हैं।
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अल्ट्रासाउंड या एमआरआई से कर सकते हैं पहचान
डॉ. कुमार शांतनु ने कहा कि रोटेटर कफ टियर की पहचान अल्ट्रासाउंड या एमआरआई से की जा सकती है। 50 से 60 वर्ष की उम्र के लोगों में यह समस्या करीब 70 फीसदी तक पाई जाती है। खिलाड़ी और अन्य 30 फीसदी लोगों को कंधे में खिंचाव, चोट के बाद लगातार दर्द या हाथ उठाने में कमजोरी हो सकती है।
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