पश्चिमी यूपी में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में भाजपा प्रबंधन के सामने सपा, रालोद व भाकियू गठनबंधन की तैयारियां धरी रह गईं। किसान आंदोलन के कारण वहां पंचायत सदस्य चुनाव में नीचे खिसकी भाजपा ने जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। भाजपा ने वहां के 24 में से 22 जिलों में जीत का परचम लहरा दिया है। जबकि रालोद व सपा सिर्फ एक-एक सीट ही कब्जा सकी है।
भाजपा को पश्चिमी यूपी में जिला पंचायत सदस्य चुनाव में जबर्दस्त झटका लगा था। सबसे ज्यादा सदस्य सपा के जीते तो कई जिलों में रालोद के सदस्यों ने जीत दर्ज। इससे सीधा संदेश गया कि किसान भाजपा के विरोध में हैं। चूंकि कृषि कानूनों के विरोध में किसान आंदोलन चल रहा है और इसकी गूंज भी है। तो अध्यक्ष चुनाव में भाजपा को यह संदेश देना था कि किसान भाजपा के खिलाफ नहीं हैं। इस संदेश के लिए अपेक्षित परिणाम जीतने की चुनौती थी। इसलिए पश्चिम यूपी में भाजपा ने अतिरिक्त ताकत लगाई। सभी 24 जिलों में उनके प्रभारी मंत्री के अलावा उस जिले के निवासी मंत्री, सांसद और विधायक को भी चुनाव कार्य में लगाया गया।
इस प्रबंधन परिणाम यह रहा कि भाजपा मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बुलंदशहर, मुरादाबाद, अमरोहा, सहारनपुर, आगरा आदि जिलों में निर्विरोध ही जीत गई। वहीं जिन जिलों में मतदान हुआ वहां भी प्रबंधन काफी काम आया। बिजनौर, रामपुर, संभल, अलीगढ़, शामली, बरेली व हाथरस भी परचम लहराया। इन जिलों में किसान आंदोलन सर्वाधिक जोर पर था। इन जिलों में अब जीत से भाजपा मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रही। उधर एटा में पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष जुगेंद्र सिंह की पत्नी सपा प्रत्याशी रेखा यादव ने चुनाव जीता।
मुजफ्फरनगर में भाकियू को झटका
मुजफ्फरनगर में मुकाबला भाजपा बनाम भाकियू था। भाजपा से वीरपाल निर्वाल और सतेंद्र बालियान के बीच मुकाबला था। बालियान को भाकियू ने समर्थन दे रखा था, लेकिन भाजपा ने इस जंग में बाजी मारी। निर्वाल को 30 मत मिले और बालियान को मात्र चार वोट ही मिल पाए। इससे भाकियू को झटका लगा है। क्योंकि वेस्ट यूपी में भाकियू किसान आंदोलन की अगुवा है।
रालोद का चक्रव्यूह नहीं तोड़ पाई भाजपा
बागपत के चुनाव पर सभी की निगाहें थीं। यहां भाजपा पूरी ताकत लगाने के बावजूद भी रालोद-सपा गठबंधन का चक्रव्यूह नहीं तोड़ पाई। रालोद प्रत्याशी ममता जयकिशोर को 12 और भाजपा उम्मीदवार बबली को केवल 7 मत ही मिले। दरअसल यहां एक बार ममता का नामांकन पत्र वापस लेने को लेकर हंगामा मचा। इससे पहले नाटकीय घटनाक्रम भी हुआ। ममता अचानक भाजपा में शामिल हो गईं और उसी दिन शाम को फिर से उन्होंने रालोद लौट गईं। बागपत की जीत को रालोद की बड़ी जीत माना जा रहा है।
भाजपा की ओर रहा बसपाइयों का रुझान
जिला पंचायत अध्यक्ष के जीत में भाजपा को बसपाइयों का भी साथ मिला। बसपा सुप्रीमो मायावती ने एलान कर दिया था कि बसपा अध्यक्ष का चुनाव नहीं लड़ेगी। इसलिएसभी की निगाहें इस पर टिकी थीं कि बसपाइयों क्या रुख रहेगा। अधिकतर जिलों में बसपा सदस्यों का रुख भाजपा उम्मीदवार की तरफ ही नजर आया।