टेलीविजन में आज अधिकांश सीरियल सास और बहू के रिश्तों पर केंद्रित होते हैं। कहीं सास बहू को ताने मारती नजर आती है तो किसी सीरियल में बहू साजिश रचते हुए दिखाई देती है।
असल जिंदगी में इन नाटकों का बहुत प्रभाव पड़ रहा है। दरअसल, आज भी सास और बहू का इकलौता ऐसा रिश्ता है जो सबसे महत्वपूर्ण है।
बस जरूरत है सास को मां और बहू को बेटी बनने की। अवध लेडीज क्लब में बुधवार को ‘बदलते परिवेश में रिश्ते और अपेक्षाएं’ विषयक चर्चा हुई तो रिश्तों में पनप रही खटास और उनसे सुखद अनुभव महिलाओं ने साझा किए।
लखनऊ विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर उषा सिन्हा ने कहा कि इंटरनेट और सोशल साइट में हम अब रिश्ते ढूंढ रहे हैं। कभी त्यौहारों पर संदेश भरे पत्र और कार्ड देते थे आज उनकी जगह एसएमएस, ईमेल, व्हॉटस अप और फेसबुक ने ले ली है।
इस वजह से लोगों के बीच सीधा जुड़ाव खत्म सा हो गया है। प्रोफेसर सिन्हा ने यह भी कहा कि रिश्ते तीन तरह के होते हैं। प्राथमिक रिश्ता, जिसमें माता पिता, पति पत्नी और बच्चा होता है। द्वितीय रिश्ते में दादा-दादी, नाना-नानी और तृतीय रिश्ता चचेरा होता है।
इनको एक धागे में पिरोने के लिए जरूरत है कि हम अपनी पीढ़ी को इंटरनेट की बैसाखी पर चलने से रोके। उनको यह जरूर बताएं कि आज संयुक्त परिवार जहां भी है खुश है, जबकि एक परिवार केवल खुद को खुश रखने की संकल्पना कर रहा है।
अर्चना जुत्शी ने सामाजिक अराजकता के लिए एकल परिवार और बुजुर्गों से दूर होती भावना को दोषी माना है। रीता सिंह ने भी संयुक्त परिवार व्यवस्था को नैतिक समाज का आधार बताया।
क्लब की सचिव मनोरमा मिश्र ने कहा कि व्यक्ति धन के पीछे इस कदर भाग रहा है कि उसके पीछे उससे जुड़े रिश्तों की चाहत उसे दिखाई नहीं पड़ती है।
इस मौके पर रेखा मित्तल, उमा त्रिगुनायक, सुदेशबाला डल, राधा शुक्ला उमा गोयल सहित कई महिलाओं ने अपने विचार व्यक्त किए।