नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के दावेदार के लिए तय कर संघ ने भाजपा नेतृत्व को सिद्धांतों से समझौता करने से बाज आने की चेतावनी दे दी है।
संघ ने यह भी साफ कर दिया है कि वह इस मसले पर किसी तरह के समझौते के लिए राजी नहीं है।
संकेत साफ है जिसको साथ रहना हो रहे, जिसे न रहना हो न रहे। इसके जरिए संघ भले ही अपने एजेंडे पर लौटने का विश्वास दिलाने में कामयाब रहा हो, पर इतने भर से मोदी की राह आसान नहीं हो जाती है।
उनके लिए यूपी में तमाम चुनौतियां इंतजार कर रही हैं। बड़ी बात यह भी है कि मोदी के लिए खुद ‘मोदी’ ही बड़ी चुनौती बन गए हैं।
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक व सामाजिक समीकरणों तथा भौगोलिक परिस्थितियों में हुए बदलाव पर नजर डालें तो यह बात और साफ हो जाती है।
2004 में भाजपा के केंद्रीय सत्ता से हटने की सबसे बड़ी वजह उत्तर प्रदेश बना था। जाहिर है कि मोदी को प्रधानमंत्री बनने के लिए उसी उत्तर प्रदेश से अपने रास्ते को प्रशस्त बनाना होगा। इसके लिए सीटों की संख्या बढ़ानी होगी।
इसमें जरा सी चूक उनके लिए गुजरात में नए संकटों की पृष्ठभूमि तैयार कर सकती है। उनके नेतृत्व, प्रशासनिक पकड़ और लोकप्रियता के दावों पर न सिर्फ पार्टी के बाहर से बल्कि भीतर से भी तर्क सहित सवाल खड़े किए जा सकते हैं।
यह बात मोदी भी भली-भांति जान रहे होंगे कि संघ के दबाव में उनके नाम पर भले ही मुहर लग गई हो लेकिन कई के दिलों में उनकी ताजपोशी के ऐलान की कसक आसानी से जाने वाली नहीं है। इन्हें जैसे ही मौका मिलेगा, वे मोदी पर हमला बोलने से बाज नहीं आएंगे।
संदेश देने की कोशिश
मोदी के नाम की घोषणा के साथ संघ ने लोगों को यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह हिंदुत्व के साथ विकास के एजेंडे पर आगे बढ़ेगी।
सत्ता के लिए समझौते नहीं होंगे। मोदी के नाम पर जो भाजपा के साथ रहने को तैयार होगा, उसी को साथ लिया जाएगा। भाजपा को अपने मूल एजेंडे के आधार पर जितनी सफलता मिलनी होगी, वह मिलेगी।
यह है हालत
वैसे तो चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष बनने के बाद ही मोदी के एजेंडे में उत्तर प्रदेश आ चुका था।
उन्होंने अपने नजदीकी और विश्वास पात्र अमित शाह को प्रदेश का प्रभारी बनकर इसके संकेत भी दे दिए थे, पर अब जब उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया गया है तो उनके लिए यह जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है।
मामला अब सीधे-सीधे उनके अस्तित्व से जुड़ गया है। जरा सी चूक उनकी छवि को कठघरे में खड़ा कर सकती है। यहां यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि इस राज्य में भाजपा पिछले एक दशक से बहुत मुश्किल दौर से गुजर रही है।
सांगठनिक ढांचा तहस-नहस हो चुका है। राज्य के नेताओं की जनता के बीच पकड़ का प्रमाण 2002 से लेकर 2012 तक हुए विधानसभा व लोकसभा के चुनाव नतीजे हैं। कई वरिष्ठ नेता एक तरह से वानप्रस्थी जीवन जी रहे हैं। बुला लिया गया तो बैठक में आ गए, नहीं बुलाया गया तो घर पर बैठे रहे।
अब जब लोकसभा चुनाव में मुश्किल से छह महीने बचे हैं और भाजपा की तरफ से मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया है तो स्वाभाविक रूप से उन्हें खुद पहल करते हुए इन स्थितियों को ठीक करने के लिए जुटना होगा।
कहां से लड़ेंगे चुनाव
मोदी के उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ने की चर्चा पहले से ही चल रही है। वे कहां से चुनाव लड़ेंगे, इस पर अभी कोई अधिकृत फैसला नहीं हुआ है, लेकिन उनके ऊपर यह दबाव जरूर आ गया है कि इस रहस्य पर से जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी पर्दा उठा दें।
उत्तर प्रदेश के लोगों की बात करें तो यहां पार्टी कार्यकर्ताओं व समर्थकों में शायद ही कोई ऐसा हो जो मोदी के उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ने का इच्छुक न हो। पार्टी के प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक कहते हैं कि उनकी निजी राय में मोदी को अब जल्दी से जल्दी उत्तर प्रदेश को भी अपनी चुनावी कर्मभूमि बनाने का ऐलान कर देना चाहिए।
इन चुनौतियों का रखना होगा ध्यान
उत्तर प्रदेश में कुछ गंभीर चुनौतियां भी मोदी का इंतजार कर रही हैं। मोदी जिस राज्य से आते हैं, उस राज्य में लोकसभा की 26 सीटें हैं। इसके विपरीत यूपी में गुजरात से लगभग साढे़ तीन गुना 80 सीटें हैं।
साफ है कि यूपी में गुजरात जैसी पकड़ बनाने के लिए उन्हें तीन गुना से ज्यादा मेहनत व ध्यान केंद्रित करना होगा। वह इसलिए भी कि 1998 के लोकसभा चुनाव में लगभग 36.48 प्रतिशत वोट लेकर 57 सीटें पाने वाली भाजपा 2002 से न सिर्फ वोटों के प्रतिशत में बल्कि सीटों की संख्या में भी नीचे लुढ़कती जा रही है।
2004 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को 22.17 प्रतिशत वोट और 10 सीटें मिलीं। 2009 में वोट 17.85 प्रतिशत रह गए और पार्टी को 10 सीटें मिलीं। विधानसभा के 2012 के चुनाव में पार्टी को लगभग 15.21 प्रतिशत वोटों से ही संतोष करना पड़ा। इसे सुधारना होगा।
ये मुसीबतें भी कम नहीं
भाजपा ने भले ही यूपी से लोकसभा चुनाव में 40 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा हो, पर इस लक्ष्य को हासिल करने की राह में कई रोड़ा भी हैं। वहीं कुछ अन्य स्थितियां भी मोदी की राह में मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं।
भाजपा को जब 57 सीटें मिली थीं तो उत्तराखंड भाजपा से अलग नहीं हुआ था। भाजपा के लिए अनुकूल माहौल बनाने वाले उत्तराखंड में लोकसभा की पांच सीटें यूपी भाजपा की पहुंच से बाहर हो चुकी हैं।
भाजपा के पास अभी 10 सीटें हैं। जाहिर है कि 40 का आंकड़ा छूने के लिए मोदी को इन सीटों को बरकरार रखते हुए 30 अन्य सीटों का इंतजाम करना होगा, जो सिर्फ उनके नाम से नहीं बल्कि जमीन तैयार करने से होगा।
मोदी के सामने चुनौतियां
1-अटल बिहारी वाजपेयी के विकल्प बनने की। उन जैसी ही यूपी के लोगों की विश्वसनीयता जीतने की।
2-मत प्रतिशत में ढाई तो सीटों में चार गुना बढ़ोतरी की।
3-राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह जैसे कई प्रमुख नेताओं के गृह प्रदेश में सभी नेताओं को एकजुट करना।
4-अयोध्या, मथुरा व काशी के मुद्दे पर लोगों में भाजपा के प्रति अविश्वास को दूर करने की।
5-उत्तर प्रदेश के लोगों को भाजपा से जोड़ने और उनके वोट हासिल करने वाले एजेंडे की तलाश।
यूपी व गुजरात के संयोग ने बनाया रास्ता
अतीत पर नजर डालें तो वर्ष 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी के गुजरात के गांधीनगर और उत्तर प्रदेश के लखनऊ से एक साथ चुनाव लड़ने के संयोग ने दिल्ली में भाजपा के लिए सत्ता का रास्ता खोला था।
भले ही 13 दिन के लिए सही, भाजपा ने वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनाई थी। दोनों ही राज्यों में भाजपा को अच्छी संख्या में सीटें मिली थीं। बाद में अटल ने गांधीनगर से त्यागपत्र दे दिया था।
संघ नेतृत्व ने जब मोदी के जरिये दिल्ली की गद्दी पर एक बार फिर भगवा सरकार स्थापित करने का संदेश साफ कर दिया है तो यह चर्चा फिर शुरू हो गई है कि अटल जैसे चेहरे के विकल्प के रूप में लाए गए मोदी भी क्या उसी राह पर चलते हुए गुजरात व उत्तर प्रदेश से एक साथ चुनाव लड़ेंगे।