सपा और बसपा में मचे घमासान से सड़क पर ही नहीं, इस बार सदन में भी विपक्ष के वार की धार कमजोर दिखेगी। कई सियासी चेहरों की जगह और भूमिका भी बदली हुई दिखेगी।
विज्ञापन
कल तक साथ-साथ सियासत करने वालों में कई आमने-सामने होंगे। कल तक एक सुर में बोलने वाले एक-दूसरे के सुरों को काटते हुए दिखाई देंगे। सवाल पूछने वाले जवाब देने की भूमिका में होंगे तो जवाब देने वाले सवाल पूछ रहे होंगे।
लगभग चौदह वर्षों से सूबे की सियासत के केंद्र में रहने वाली बसपा सदन के भीतर एक कोने में सिमटी दिखेगी तो अंतर्विरोधों से घिरी सपा भी सत्तारूढ़ दल को मजबूती से घेर पाएगी, इसमें संदेह है। ये परिस्थितियां स्वाभाविक रूप से सत्तारूढ़ भाजपा को राहत पहुंचाएंगी।
विज्ञापन
कहने को तो सपा मुख्य विपक्षी दल है, पर उसके पास संख्या बल काफी कम है। सपा के गठन के बाद पहली बार सदन में पार्टी के 50 से भी कम विधायक हैं। ऊपर से कुनबे की कलह ने आपस में इतना बिखराव कर दिया है कि इसका असर सदन के भीतर भी दिखाई देगा।
इससे सत्तापक्ष पर सपा के हमले की धार कुंद दिखाई दे सकती है। यह पहला मौका होगा जब विधानसभा में सपा की तरफ से सत्तापक्ष पर आक्रमण की बागडोर मुलायम परिवार के सदस्य के हाथ में नहीं होगी। स्वाभाविक रूप से इसका असर सदन के भीतर सपा विधायक दल की भूमिका पर दिखाई देगा।
इनकी गैरहाजिरी भी सपा की समस्या
अंबिका चौधरी
- फोटो : demo pic
शिवपाल व आजम के बाद अंबिका चौधरी भी ऐसे नेता थे जो अपने तर्कों से सत्तापक्ष को तिलमिला सकते थे, लेकिन वह इस बार विधानसभा में नहीं होंगे। वह अब विधान परिषद के सदस्य हैं, पर वहां भी सत्तापक्ष पर सपा के हमलों को वह धार नहीं दे पाएंगे क्योंकि चुनाव के दौरान वह बसपा में शामिल हो चुके हैं। इस नाते तकनीकी रूप से भले ही वह सपा में हों लेकिन सपा की तरफ से उनका तर्क रख पाना मुश्किल है।
ज्यादा संभावना यही है कि वह शायद सदन में ही न दिखें। अगर वह सदन में आएंगे और सरकार पर निशाना साधेंगे तो स्वाभाविक रूप से भाजपा उनसे पार्टी से संबद्धता का सवाल पूछकर चुप रहने को मजबूर करेगी।
इनके अलावा अवधेश प्रसाद, उदयराज यादव, अरविंद सिंह गोप, ओमप्रकाश सिंह, शाहिद मंजूर, नारद राय व रियाज अहमद के भी सदन में न होने का असर सपा के तेवरों पर पड़ेगा।
कांग्रेस ने भले ही सपा के साथ गठबंधन करके विधानसभा चुनाव लड़ा हो लेकिन सदन में इस गठबंधन के एकजुट दिखाई देने के आसार कम ही हैं। संभवत: पहली बार सदन में कांग्रेस इतनी कमजोर स्थिति में है।
पार्टी के पास सिर्फ सात विधायक हैं। पार्टी विधानमंडल दल के नेता के रूप में पिछले सत्र तक कांग्रेस की तरफ से हमलों की बागडोर संभालने वाले प्रदीप माथुर इस बार सदन में नहीं हैं। डॉ. रीता बहुगुणा जोशी कांग्रेस छोड़ चुकी हैं और वह कैबिनेट मंत्री के रूप में सरकार की ओर से मोर्चा संभालेंगी।
कांग्रेस की तरफ से हमलों को धार देने व मोर्चा संभालने वाले विवेक सिंह, गयादीन अनुरागी, पंकज मलिक, अखिलेश प्रताप सिंह जैसे चेहरे भी इस बार विधानसभा में नहीं दिखेंगे।
आजम के वार न शिवपाल के तेवर
शिवपाल यादव
मुलायम सिंह यादव के केंद्रीय राजनीति में जाने के बाद शिवपाल सिंह यादव ही मुख्य रूप से सपा की सियासी फौज की कमान संभालते थे। मायावती के मुख्यमंत्रितत्व काल में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में शिवपाल के आक्रामक तेवर सभी को याद होंगे।
सरकार के फैसलों के खिलाफ वह आक्रामकता के साथ सवाल खड़े करते थे। प्रदेश को चार भागों में बांटने के तत्कालीन बसपा सरकार के प्रस्ताव के विरोध में देर रात तक हंगामा शिवपाल के तेवर बताने के लिए काफी है।
पर, इस बार वह सपा की केंद्रीय भूमिका में नहीं हैं। नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी हैं। ऊपर से भतीजे अखिलेश के फैसलों से नाराज शिवपाल का सदन में सपा की तरफ से सरकार को घेरने की कोशिश करते नजर आना मुश्किल है।
ऐसे में सपा के हमले की धार कुंद होना तय है। आजम खां भी सपा खेमे के ऐसे नेता हैं जिनके तीखे शब्दबाण सरकार को बेचैन कर सकते थे, पर नेता प्रतिपक्ष न बनाए जाने से वह भी अनमने से हैं।
इसका प्रमाण चुनाव नतीजों के बाद अभी तक सपा विधायक दल की किसी बैठक में आजम का शामिल न होना है। अगर आजम अन्यमनस्क ही रहते हैं तो इससे भी सपा के हमले की धार कुंद होगी।
एक तो विधानसभा में सिर्फ 19 विधायक और ऊपर से पार्टी में सिर फुटौवल, निश्चित रूप से सदन में बसपा के हमलों की धार को कुंद करेगी। पहले स्वामी प्रसाद मौर्य की बगावत और अब नसीमुद्दीन सिद्दीकी के मायावती के खिलाफ तीखे तेवर सदन में बसपा के लोगों को सवाल पूछने का मौका नहीं देंगे, ऊपर से बसपा को ही सवालों के घेरे में खड़ा करेंगे।
जो मौर्य सरकार में बसपा की तरफ से विपक्ष के सवालों का जवाब देते थे तो विपक्ष में बसपा की तरफ से सत्तापक्ष पर हमले की बागडोर संभालते थे, सवाल पूछते थे, वह इस बार मंत्री होने के नाते सरकार की तरफ से मोर्चा संभालते नजर आएंगे।
मौर्य ही नहीं, कुछ दिन पहले तक बसपा की आवाज बुलंद करने वाले बृजेश पाठक, दारासिंह चौहान, डॉ. एसपी सिंह बघेल, लक्ष्मीनारायण चौधरी, नंदगोपाल नंदी व धर्मसिंह सैनी भी मंत्री के रूप में भगवा टोली की तरफ से सदन में खड़े दिखाई देंगे और बसपा के हमले को कमजोर करेंगे। बसपा की आवाज को बुलंद करने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बसपा के साथ न होने से विधान परिषद में बसपा और भी ज्यादा कमजोर नजर आएगी।