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Lucknow News: आगे श्रीकृष्ण लीला को मंच पर उतारने की इच्छा

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अ​भिनेता आशुतोष राणा।
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लखनऊ। देश के 11 राज्यों में ''''हमारे राम'''' महानाट्य का 160 सफल मंचन कर चुके बॉलीवुड अभिनेता आशुतोष राणा दो दिनों से लखनऊ में हैं। रविवार को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के जुपिटर हॉल में दो शो करने के बाद वह सोमवार को यहीं पर आयोजित रामायण कॉन्क्लेव में हमारे राम का मंचन करने पहुंचे। इस दौरान उन्होंने अमर उजाला से खास बातचीत में बताया कि अभी तो उनका लक्ष्य है कि देश के सभी राज्यों में ''''हमारे राम'''' का मंचन हो। बोले- उनकी इच्छा है कि इसके बाद अब वह योगेश्वर श्रीकृष्ण की लीला मंच पर उतारें।
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आशुतोष राणा ने कहा कि हमारे राम के जरिये हमने कई अनछुए पहलुओं को मंच पर उतारने का प्रयास किया है। दशानन रावण के कई भाव पक्षों को प्रमुखता से उजागर किया है। उन्होंने बताया कि उनकी टीम में 122 कलाकार हैं, जो इस अद्भुत राम कथा को मंच पर कठिन मेहनत के साथ उतार रहे हैं। जब पूछा गया कि उन्हें फिल्म और नाटक में से ज्यादा पसंद क्या है तो मुस्कुराकर बोले, ''''मुझे तो अभिनय से प्रेम है और इसी में मुझे परम आनंद की अनुभूति होती है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि अभिनय का प्रारूप नाटक है या फिल्म, मुझे दोनों में समान रूप से प्रसन्नता होती है।''''

उन्होंने एक प्रश्न के जवाब में कहा, ''''जहां तक रावण का किरदार निभाने का सवाल है तो मैं यही कहूंगा कि इसे मंच पर वही व्यक्ति उतार सकता है, जिसकी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम में अगाध आस्था हो। हर इंसान में अच्छाई और बुराई दोनों होती है। हमने युगों-युगों से रावण में केवल बुराई ही देखी और हर साल उसका पुतला भी जलाते हैं, लेकिन प्रकांड विद्वान और शिव के परमभक्त रावण के सकारात्मक पहलुओं को जानने का कभी प्रयास नहीं किया। हमारे राम में रावण के दोनों पक्षों को उजागर किया गया है।'''' (माई सिटी रिपोर्टर)
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सभी नौ रसों में समाहित हैं राम : आशुतोष राणा

हमारे राम मंचन से पूर्व आशुतोष राणा ने जुपिटर हॉल में एक संवाद कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया, जहां उन्होंने दर्शकों के सवालों के भी जवाब दिए। उन्होंने राम के विभिन्न स्वरूपों की व्याख्या करते हुए कहा कि राम सभी नौ रसों में समाहित हैं। राम से जो भी जिस भाव से मिलता है, वे उसे निशंक ही करते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी अपनी दृष्टियों की सीमा होती है और हम उसी के अनुसार अपने-अपने तरीके से राम को देखते हैं और राम हमें द्वंद्वरहित करते हैं। वे बोले- एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घर-घर में बैठा। जिसकी जैसी दृष्टि उसकी वैसी ही सृष्टि होती है। कहा कि रोम-रोम में प्रवाहित होने वाली चेतना ही राम है। अयोध्या का अर्थ है जहां युद्ध नहीं होता। उन्होंने भगवान राम की मां कौशल्या को कुशलता बताया तो वहीं कैकेयी को कर्मठता और सुमित्र को मित्रता बताया। कहा कि अगर हम भी युक्ति, शक्ति और भक्ति का सामंजस्य बैठा लें तो जीवन सरल हो जाएगा। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि सिनेमा के माध्यम से हम कनेक्ट तो होते हैं, लेकिन कम्युनिकेट नहीं होते, जबकि नाटक में हम कनेक्ट के साथ कम्युनिकेट भी होते हैं। महाकुंभ में उमड़ी भीड़ पर वह बोले कि यह आस्था का अतिरेक नहीं है। भीड़ में भी एकांत का आनंद है, बशर्ते हम जागृत अवस्था में हों। किसी की आस्था का निर्णय कोई दूसरा नहीं कर सकता। आशुतोष राणा के साथ संवाद के दौरान वरिष्ठ पत्रकार सुधीर मिश्रा ने प्रश्न पूछे।
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