सीधे तौर पर न सही, लेकिन सांकेतिक रूप से मोदी ने दीपोत्सव से रामराज्य की कसौटी पर अपनी तथा योगी सरकार को कसते हुए लोगों को यह भी समझाने का प्रयास किया कि उनका प्रयास राम के आदर्शों की कसौटी का राज बनाना है। जहां न कोई भूखा हो और न बीमार। न कोई विपन्न हो न किसी को जरूरत के सामान का अभाव हो। तभी तो सीएम योगी आदित्यनाथ ने जहां ‘दैहिक, दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि ब्यापा...’ से प्रधानमंत्री के जनकल्याणकारी कार्यों का उल्लेख किया तो वहीं प्रधानमंत्री ने ‘सबका साथ-सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास’ को राम राज का आधार बताते हुए इन्हीं कसौटियों पर काम करने का संकल्प जताकर राम के सरोकारों से खुद को जोड़ा। साथ ही उन लोगों को राम की धरती से ही जवाब देने की कोशिश जो उन पर या भाजपा की अन्य सरकारों पर सांप्रदायिक या मुस्लिम विरोधी अथवा दलित, शोषित एवं वंचित लोगों की उपेक्षा का आरोप लगाते हैं। उन्होंने यह कहने में भी कोताही नहीं बरती कि राम से जितना सीख सकते हैं उतना सभी को सीखना चाहिए। राम न तो किसी को पीछे छोड़ते हैं और न किसी को हीन समझते हैं।
सियासी समीकरण भी साधे
अयोध्या देश में सियासत की धारा में बदलाव की धुरी रही है। यह बदलाव जिस अयोध्या के राम जन्मभूमि मंदिर की मुक्ति आंदोलन एवं अभियान के सहारे हुआ है, 90 के दशक में इस अभियान के प्रमुख चेहरे लालकृष्ण आडवाणी के सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा की बागडोर मोदी ने ही संभाली थी। स्वाभाविक है कि उन मोदी की नजरों से राम के सरोकारों से सियासत में मिले विस्तार एवं मजबूती के समीकरण कैसे ओझल होते। इसलिए उन्होंने सरोकारों के साथ सियासी समीकरणों पर भी नजर रखने में चूक नहीं की। उन्होंने संकेतों से ही सही, लेकिन सियासत में भाजपा के सरोकारों को विस्तार देने की कोशिश की। उन्होंने यह उल्लेख करते हुए कि राम वन गए तो सबको साथ लिया।
शबरी के आश्रम गए और प्रेम को सम्मान देते हुए जूठे बेर खाए। सबको साथ लेने तथा सबके प्रयास की ही ताकत थी जो वह स्वर्णमयी लंका देखकर भी हीन भावना से ग्रस्त नहीं हुए बल्कि वनवासियों, गिरिवासियों, रीछ एवं वानरों के साथ रावण को पराजित किया। लंका विजय के बाद जब राज गद्दी संभाली तो भी इन सबको सम्मान दिया। राम के लिए सब अपने हैं कहते हुए एक तरह से मोदी ने राम को आदर्श मानने के कारण उनके लिए दलित, शोषित, वंचित, पिछड़े भी उतने ही सम्मानीय हैं जितने दूसरे।
राजनीतिक शास्त्री प्रो. एसके द्विवेदी कहते हैं कि प्रधानमंत्री की ये बातें विभिन्न प्रांतों, भाषा-भाषी एवं जातियों खासतौर से दलित, शोषित, वंचित एवं पिछड़ी जाति के लोगों को यह विश्वास दिलाने कोशिश है कि हिंदुत्व के सरोकारों को साकार करने के कार्य में इनका भी कल्याण जुड़ा हुआ है। हिंदुत्व के दर्शन पर काम करने वाली सरकारें ही उनके सरोकारों का भी सही मायने में सम्मान कर सकती हैं। इसलिए इन्हें किसी जाति, पंथ जैसे समीकरणों में न उलझकर भाजपा को मजबूत करना चाहिए।