टाइटल- 1000 टन सोना: खजाने की खोज।
प्लेटफॉर्म- डोंडियाखेड़ा किला, कहानीकार- बाबा शोभन सरकार।
निर्माता- आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया।
निर्देशक- केंद्र सरकार और मुख्य सहयोगी जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, स्थानीय विधायक, जिला प्रशासन और बाबा के कथित सेवक।
भले ही यह किसी फिल्म की कास्टिंग लग रही हो, लेकिन यह एक सच्ची फिल्मी कहानी है।
इसमें मसाला मिक्स करने के लिए हर किसी ने अपना योगदान दिया। जिम्मेदार अधिकारियों ने समय-समय पर खजाने की खोज फिल्म में तड़का लगाने के लिए झूठे बयान और तथ्यों को स्क्रिप्ट की मांग पर बदला भी।
अब खुदाई पूरी होने के बाद सच भी सामने आ गया है।
खुला झूठ का पुलिंदा
सोमवार को एएसआई ने डोंडियाखेड़ा में खुदाई बंद करा दी। इस बीच अधिकारियों और बाबा के झूठों का पुलिंदा भी खुल गया। झूठ और नाटकीयता की शुरुआत तब हुई जब बाबा ने सपने के आधार पर 1000 किग्रा सोना किले में गढ़ा होने का दावा किया।
नाटक शुरू हुआ तो स्थानीय विधायक और ग्राम प्रधान के अलावा कथित सेवक भी इसमें अपनी भूमिका निभाने में लग गए। 23 दिन की खुदाई में खजाने के अलावा सब कुछ निकला।
हड्डिïयों, टूटे बर्तन, चूडिय़ा और लोहे की कीलों से लेकर अधिकारियों के झूठे दावे भी सामने आए।
देश की वैज्ञानिक संस्था से जुड़े जियोआर्कियोलॉजिस्ट डॉ. एस राव का कहना है कि दो ट्रेंच में गहराई तक खुदाई किसी के खास चीज की तलाश के लिए ही की जाती है।
डॉ. राव के मुताबिक, अगर खुदाई में कुछ नहीं मिलना था तो यह केवल 1.5 फुट पर खोदकर ही पता चल गया होगा। इसे पिट्स मिलना कहते हैं। यह तब होता है जब किसी जगह पर खोदकर कुछ दबाया गया हो।
कैसी-कैसी बयानबाजी
स्थानीय एसडीएम विजयशंकर दुबे ने कहा था, गढ्ढों को बंद करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। कुछ समय में यह गड्ढों एएसआई के निर्देश के मुताबिक भरवा दिए जाएंगे।
सपना देखने वाले बाबा शोभन सरकार ने कहा, खजाने की रक्षा ईश्वरीय शक्तियां कर रही हैं। जब तक खजाना नहीं मिल जाता, सरकार से पत्राचार जारी रहेगा। खजाना अपनी ही जगह है।