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चिता के पास आकर बेटी बोली ‘हम कैसे रहेंगे मम्मी’

Sun, 20 Jul 2014 02:27 AM IST
विवेक त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ
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‘मां अब कभी नहीं आएगी न...’ गुड़िया के मुंह से निकले इन शब्दों से पहले श्मशान की अंधेरी रात का सन्नाटा सिर्फ उसकी मां की चिता में जलती लकड़ियों की आवाज से टूट रहा था।
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गुड़िया अपने छोटे भाई का हाथ पकड़कर फिर बोली... ‘हम कैसे रहेंगे मम्मी।’ इसके बाद जुबां जैसे आंसुओं में डूब गई।

सिसकियां और हिचकियां गूंज उठीं। श्मशान घाट पर मौजूद लोगों के कलेजे छलनी हो गए। युवती के पिता बोले, ‘...हम हैं बिटिया। एक आंसू नहीं आने देंगे लाडली की आंखों में...।’

मां की गोद में बैठकर नन्हीं गुड़िया तमाम बार इस रास्ते से गुजरी होगी, लेकिन शायद ही कभी अंधेरी रात में इस डरावनी जगह आने का ख्याल भी मन में आया हो। वो भी ऐसे वक्त जब मां की चिता जल रही है।
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बदल गई जिंदगी

शुक्रवार आधी रात को बैकुंठधाम पर मां की जलती हुई चिता को बिना पलक झपकाए देख रही बच्ची गुमसुम खड़ी जरूर थी, लेकिन उसके मन में झंझावत चल रहे थे।

अचानक बिटिया अपनी उम्र से बड़ी हो गई थी। अब तक तो मां के आंचल में सारे दर्द भुला देती थी। लेकिन अब कौन उसे संभालेगा।

यह ऐसा वक्त था जब मां के साथ बिताया गया एक-एक पल उसकी आंखों में तैर रहा था। रात में सोती तो मां के पहलू में, सुबह जागती तो मां की हाथ पकड़कर।

अब कौन थपकी देकर सुलाएगा? कौन होमवर्क कराएगा? कौन टोकेगा, ‘बारिश में मत नहाओ। तबियत खराब हो जाएगी।’ मां क्या गई, एक पल में नन्हीं बिटिया की जिंदगी बदल गई।

नन्ही बेटी को हुआ जिम्मेदारी का अहसास

नाना से बोली, ‘हमारा ख्याल कौन रखेगा।’ एक बार फिर घाट पर मौजूद लोगों ने आंसू रोकने के लिए जबड़े भींच लिए। सांस थाम ली। लेकिन आंखों का बरसना नहीं रुका।

भाई की तलाश में नजरें घुमाईं तो वह किसी रिश्तेदार के पास खड़ा दिख गया। बिटिया दौड़कर उसके पास चली गई। सिर पर ठीक वैसे ही हाथ फिराया जैसे कभी मां फिराती थी।

उस नन्हीं सी बच्ची को शायद जिम्मेदारी का अहसास हो रहा था। भाई का हाथ कसकर पकड़ लिया। रात करीब तीन बजे मां की चिता तो शांत हो गई लेकिन बिटिया के कलेजे की आग भड़क चुकी थी।
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मां की बातें याद रखना

नाना से पूछा, ‘भगवान ने हमारे साथ ऐसा क्यों किया?’ उसकी मासूम बातों का जवाब किसी के पास नहीं था। नाना बोले, ‘गुड़िया बस मम्मी की तरह बनना। उनकी बातें याद रखना।’

इसके बाद उन्होंने बिटिया की अंगुली पकड़ ली और पोते को गोद में उठा लिया। बोझिल कदमों से सब श्मशान घाट के बाहर चले तो बिटिया की सिसकियां फिर बंध गईं।

मुड़कर आखिरी बार मां के अवशेषों की तरफ देखा। नजदीक ही भगवान शंकर की प्रतिमा की तरफ देखकर बोली, ‘जिसने मम्मी को छीना, उसको कड़ी सजा जरूर देना।’ रात को ही नाना दोनों बच्चों को लेकर देवरिया चले गए।
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