लखनऊ। विश्व फेफड़ा कैंसर दिवस पर शनिवार को डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि धूम्रपान के अलावा घरों की पुरानी एस्बेस्टस वाली छतें, निर्माण व तोड़फोड़ के दौरान उड़ने वाली धूल, कुछ औद्योगिक उत्पाद और टैल्कम पाउडर भी फेफड़ों के कैंसर का कारण बन सकते हैं। एस्बेस्टस के बेहद महीन रेशे सांस के साथ फेफड़ों में पहुंचकर वर्षों तक जमा रहते हैं और 25 से 50 वर्ष बाद भी फेफड़ों के कैंसर या मेसोथेलियोमा जैसी गंभीर बीमारी का कारण बन सकते हैं।
रेस्पीरेटरी मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. अजय वर्मा ने बताया कि पहले एस्बेस्टस का उपयोग छत की चादरों, पाइप, ब्रेक, गैस्केट और अन्य औद्योगिक उत्पादों में होता था। भारत में इसका खनन बंद है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में इसका उपयोग जारी है। पुरानी इमारतों को तोड़ने, खदानों और जहाज तोड़ने के उद्योग में खतरा अधिक रहता है।
डॉ. राजा सिंह ने कहा कि एस्बेस्टस युक्त सामग्री की मरम्मत या तोड़फोड़ के दौरान सुरक्षा उपकरण पहनना, नियमित स्वास्थ्य जांच कराना और एस्बेस्टस के सुरक्षित विकल्प अपनाना जरूरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे होने वाली फेफड़ों की क्षति स्थायी होती है, इसलिए बचाव और जागरूकता ही सबसे बड़ा उपाय है।