मेडिकल स्टोर पर 30-35 रुपये में मिलने वाली एक केमिकल की शीशी, एक साधारण सा कंप्यूटर और हर वक्त खुराफातों में उलझे रहने वाले दिमाग।
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पुराने चेक की क्लोनिंग कर करोड़ों रुपये इधर से उधर करने के लिए बस इतना ही काफी है। चेक क्लोनिंग करने वाले गैंग के शातिर जब एसटीएफ की टीम को मॉड्स अपरेंडी की जानकारी दे रहे थे तो सबके चेहरों पर आश्चर्य के भाव तैर रहे थे।
न कोई ऑफिस, न मशीनें, न दौड़-भाग। बस चलते-फिरते और बात करते हुए शातिर बीते करीब दो साल से लाखों-करोड़ों का खेल रहे थे।
एसटीएफ अफसरों का अनुमान है कि गैंग ने अब तक 50 करोड़ से अधिक की रकम विभिन्न खातों में ट्रांसफर करके निकाली है।
इस तरह वारदात को देते थे अंजाम
क्लोन चेक बनाने वाले इलाहाबाद के मोहम्मद शमशाद उर्फ शानू और मुइनुद्दीन सिद्दीकी उर्फ पप्पू उर्फ साहिल से पूछताछ में पता चला है कि गैंग का नेटवर्क पूरे देश में फैला है। सिर्फ यूपी में ही राजधानी के अलावा इलाहाबाद, कानपुर, आगरा में गैंग के 20 लोग सक्रिय हैं।
इसके अलावा मध्य प्रदेश, जमशेदपुर, मुंबई, कोलकाता में भी गैंग की जड़ें फैली हैं। नई दिल्ली में भी गैंग ने कुछ क्लोन चेक कैश कराए हैं। एसटीएफ सूत्रों ने बताया कि बैंक में कैश हो चुके चेक का बंडल बनाकर अव्यवस्थित रूप से रख दिया जाता है।
बैंक के कर्मचारियों से सेटिंग कर गैंग इन बंडल को हासिल कर लेता है। इसके बाद इनमें से चार-पांच लाख या उससे बड़ी राशि के चेक छांट लिए जाते हैं। इन चेक से अकाउंट नंबर, होल्डर का नाम, हस्ताक्षर, माइकर कोड मिल जाते हैं।
इसके बाद अकाउंट होल्डर की तरफ से शातिर ही बैंक को प्रार्थनापत्र देकर बीते एक-दो महीने का स्टेटमेंट निकलवाते। ट्रांजेक्शन की जानकारी मिलने के बाद बाद गैंग उसी बैंक में किसी सामाजिक या धार्मिक संस्था के नाम से खाता खुलवाता है।
बैंककर्मी भी नहीं पकड़ पाते थे
फिर मेडिकल स्टोर पर मिलने वाले केमिकल से चेक से नाम, नंबर और माइकर कोड मिटा दिया जाता है। केमिकल से सिर्फ चेक पर लिखे शब्द और अक्षर मिटते हैं, डिजाइन और मूल रंग जस का तस रहता है।
साफ चेक पर कंप्यूटर से सारी जानकारी चढ़ाकर अकाउंट होल्डर के फर्जी हस्ताक्षर किए जाते हैं। तैयार क्लोन चेक पर सामाजिक या धार्मिक संस्था का नाम और रकम भरकर बैंक में पेश की जाती है। क्लोन चेक पर मूल चेक के नंबर से आगे के नंबर डाले जाते हैं, जिससे बैंककर्मियों को शक न हो।
चूंकि, चेक अकाउंट पेई होने के चलते काउंटर पर बैठे बैंककर्मी पास कर देते हैं। रकम अकाउंट में ट्रांसफर होते ही निकाल ली जाती है। पहला चेक कम रकम का होता, जिसके पास होने के बाद बड़ी रकम निकाली जाती है।
एक ही अकाउंट की सात-आठ चेक लगाकर गैंग ने 50 लाख से एक करोड़ रुपये तक की रकम ट्रांसफर कराई है। एसटीएफ सूत्रों ने बताया कि गैंग के अन्य सदस्यों के बारे में भी पता चला है, जिनकी तलाश में दबिश दी जा रही है।
फर्जी आईडी से खुलवाए बैंक अकाउंट
चेक की क्लोनिंग करने वाले गैंग के बदमाश फर्जी आईडी से बैंकों में अकाउंट खुलवाते थे। एसटीएफ सूत्रों ने बताया कि गिरफ्तार किए गए शानू और पप्पू के पास से भी फर्जी आईडी मिली हैं। शानू ने रवि सिंह और पप्पू ने राजकुमार के नाम से फर्जी आईडी बनवाई थीं।
प्लेन चेक पर इलाहाबाद से चढ़वाते थे नाम-नंबर केमिकल से चेक पर लिखे अक्षर व नंबर मिटाने के बाद इलाहाबाद के एक कंप्यूटर एक्सपर्ट से उनमें दूसरा नाम-नंबर चढ़ाया जाता था।
एक चेक में नाम-नंबर चढ़ाने के लिए एक्सपर्ट को 500 से 1000 रुपये तक दिए जाते थे। एसटीएफ सूत्रों ने बताया कि क्लोन चेक पर मूल अकाउंट होल्डर के असली हस्ताक्षर के चक्कर में गैंग के सदस्य दर्जनों चेक बर्बाद कर देते थे। इलाहाबाद के उक्त कंप्यूटर एक्सपर्ट की भी तलाश की जा रही है।
क्लोन चेक कैश कराने से पहले गैंग के शातिर बैंक को प्रार्थनापत्र देकर मूल अकाउंट होल्डर का मोबाइल नंबर बदलवा देते थे। इससे अकाउंट होल्डर को चेक कैश होने की जानकारी तत्काल नहीं मिल पाती थी।
इसके लिए अकाउंट होल्डर की तरफ से मोबाइल खोने का प्रार्थनापत्र बनाते और उस पर किसी थाना की फर्जी मुहर लगाकर बैंक में दे देते हैं। इस प्रार्थनापत्र में बैंक से किसी दूसरे नंबर पर अलर्ट मैसेज भेजने की गुजारिश की जाती है। थाने की मुहर देखकर बैंक अफसर प्रार्थनापत्र में दिए गए नए नंबर को अपने रिकॉर्ड में दर्ज कर लेते हैं।
मुंबई से आइडिया लेकर गोरखधंधे में उतरा शानू मोहम्मद शमशाद उर्फ शानू मुंबई में आईसीआईसीआई बैंक में सेल्स मैनेजर था। एसटीएफ सूत्रों ने बताया कि उसके सामने ही चेक क्लोनिंग की एक घटना हुई थी। शानू ने चेक क्लोन कराने वाले को पकड़ लिया था।
इसी से आइडिया लेकर उसने चेक क्लोनिंग का गोरखधंधा शुरू किया था। चूंकि, वह बैंक की कार्यप्रणाली से पूरी तरह से परिचित था, इसलिए ज्यादा होमवर्क भी नहीं करना पड़ा।