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कैंसर पीड़िता गैंग रेप विक्टिम बोली, अब किसी को दोस्त नहीं बनाऊंगी

Tue, 12 Dec 2017 05:49 PM IST
रोली खन्ना/अमर उजाला, लखनऊ
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‘पापा मुझे वहां नहीं जाना। वहां लोग ठीक नहीं...। क्या कहेंगे? कुछ पूछेंगे तो...? आप एक दूसरा घर ले लो... पापा वहीं ले चलो।’ आंखों में आंसू...। भर्राता गला...। कांपते होंठ...। एक चौदह साल की बच्ची के ये शब्द...। इन शब्दों को सुनकर कलेजा मुंह को आ जाता है।
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यह बच्ची ब्लड कैंसर से जूझ रही है। पर, भरोसे का खून होने का दर्द...? जिसे दोस्त समझा उसने अपने पांच दोस्तों के साथ मिलकर उससे दरिंदगी की। जिस पिता की उम्र के शख्स से लिफ्ट मांगी उसने भी दरिंदगी की।

सबकुछ सोचकर दिमाग सुन्न-सा होने लगता है। अपनी मान-मर्यादा का फिक्र...। समाज क्या कहेगा? लोग क्या कहेंगे? बेटियां ऐसी ही होती हैं। इतनी कम उम्र में इतनी समझ...। 
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बच्ची पहले भी कई बार अस्पताल गई। ब्लड कैंसर का इलाज कराने। पर, इस बार उसकी वह डॉक्टर आंटी नहीं थीं, जो हौसला देतीं। कैबिनेट मंत्री रीता जोशी आश्वासन देकर बाहर जाती हैं।

इसी बीच बच्ची के पिता कहते हैं-चलो घर चलते हैं। पिता के मुंह से बोल फूटे और बच्ची फफक पड़ी-पापा मुझे वहां नहीं जाना...। पूरे परिवार की आखें भर आती हैं। बहरहाल खुद को संभालते बेटी के पीठ पर प्यार की थपकी देते पिता आगे बढ़ते हैं।

परिवार के साथ ही हम सरोजनीनगर में उस मोहल्ले में पहुंच जाते हैं जहां बच्ची का घर है। अवचेतन मस्तिष्क में कुछ घूमने लगता है।

दिमाग में कुछ धुंधली-सी तस्वीर अनायास ही दिमाग में कौंधने लगती है। घर की सबसे छोटी बेटी...। मुझे नाम देना होता तो शायद ‘छुटकी’ही देती। यहीं मोहल्ले में खेलती-कूदती रही होगी...। गली-मोहल्ले में सन्नाटा पसरा है। पर, हर नजर सवाल करती दिख रही है। 

अब किसी को दोस्त नहीं बनाऊंगी

भरोसे का खून, कितना कष्ट देता है...। ये बच्ची के शब्द बयां करते हैं। शुभम मेरा सबसे अच्छा दोस्त था। मैं तो मम्मी से पैसा लेकर चाऊमीन खाने गई थी। शुभम ने कहा तो उसके साथ आगे चली गई...। अब कभी किसी को दोस्त नहीं बनाऊंगी।

मां का दर्द आक्रोश में बदला, बोलीं- कहां जाएं हम बेटियों को लेकर

घर पहुंचने पर मां दहाड़े मारकर रो पड़ी। जब बोल फूटते तो दरिंदों के लिए बद्दुआ..। पति बार-बार समझाते हैं। कहते हैं- चुप हो जा...दिल पर पत्थर रख ले...। पर, वह कुछ देर में फिर रो पड़तीं- तीन-तीन बेटियां हैं, आखिर कहां जाएं हम....बेटियां हैं तो क्या घर में कैद कर दें? अरे कैसा समाज है ये?

कैंसर का इलाज हो जाता पर इस दर्द का क्या होगा?

बातचीत में पता चला कि शनिवार की रात अस्तव्यस्त हालत में बेटी के घर पहुंचते ही पिता तो चले गए थाने और मां ने बड़ी बेटी को ससुराल में फोन कर बुला लिया था। एक और छोटी बहन है, जो बीए कर रही है। दोनों बहनों ने अस्पताल से घर तक एक पल भी ‘छुटकी’ को अकेले नहीं रहने दिया। बड़ी दीदी कहती है कि हमारी बहन को कैंसर है, उसका इलाज तो हम करा ही रहे हैं, पर दरिंदों ने ऐसा जख्म दिया। जब तक उन्हें सजा नहीं मिलती हमारे परिवार को चैन नहीं आएगा।
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पिता ने कहा-मेरा अभिमान हैं बेटियां

तमाम सवालों, आसपड़ोस की सवालियां नजरें और पुलिसिया कार्रवाई से जूझते हुए 50 घंटे से अधिक हो गए। बच्ची के पिता कहते हैं, हम सबको मालूम है कि बेटी अपने दोस्त से बातें करती थी। दरिंदों ने मेरी बेटी की जिंदगी बर्बाद कर दी। मेरा अभिमान हैं बेटियां, इन्हें टूटने नहीं दूंगा। अभी हम पुलिस कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं। दरिंदों को सजा जरूर दिलवाऊंगा।
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