हजरतगंज कोतवाली का मालखाना संवेदनशील और गंभीर मामलों की कब्रगाह बन गया है। टेररिस्ट की डायरी गुम होने के साथ ही खाकी की रिश्वतखोरी का अहम साक्ष्य बनी सीडी भी ढूंढे नहीं मिल रही।
महिला थाना की दो सिपाहियों के रंगे हाथों पकड़े जाने के बाद यह सीडी तत्कालीन एएसपी तरुण गाबा ने बनवाई थी। चंडीगढ़ में डेपुटेशन पर तैनात तरुण गाबा इस मुकदमे में गवाही के लिए लखनऊ आए,तब खुलासा हुआ।
अदालत में फटकार के डर से पुलिस इस मामले को मैनेज करने की कोशिश कर रही है। वर्ष 2004 में महिला थाना की दो सिपाहियों को रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया।
हजरतगंज थाना में एफआईआर दर्ज करने के साथ ही तत्कालीन एएसपी तरुण गाबा ने साक्ष्य के तौर पर पूरे घटनाक्रम की रिकॉर्डिंग कराई थी।
पुलिस सूत्रों ने बताया कि रिकॉर्डिंग की सीडी बनाकर हजरतगंज के मालखाना में रखा गया था। लेकिन रहस्यमय परिस्थितियों में सीडी गायब हो गई।
बीते दिनों एविडेंस के लिए तरुण गाबा लखनऊ आए तो पता चला सीडी गायब है। पुलिस सूत्रों ने बताया कि उन्होंने राजभवन में तैनात एक पुलिस अफसर से संपर्क किया, जिन्होंने सीओ हजरतगंज से इस बाबत पूछताछ की।
पुलिस सूत्र बताते हैं कि महिला थाना की सिपाहियों को बचाने के लिए हजरतगंज कोतवाली की पुलिस ने ही मिलीभगत कर सीडी गायब कराई है।
कोतवाली की शिफ्टिंग की आड़ में हुए बड़े-बड़े खेल
हजरतगंज कोतवाली के मालखाना से टेररिस्ट की डायरी और सिपाहियों की रिश्वतखोरी की सीडी जैसे तमाम साक्ष्य गायब हैं। कोतवाली की शिफ्टिंग की आड़ में शातिर पुलिसकर्मियों ने ऐसे कई बड़े-बड़े खेल किए हैं।
कुछ मामले खुल गए हैं जबकि तमाम मामलों का खुलासा होना अभी बाकी है। वर्ष 1909 में शुरू हुई हजरतगंज कोतवाली जुलाई 2009 में वाल्मीकि मार्ग पर शिफ्ट की गई थी।
फायर स्टेशन और महिला थाना भी इसके साथ ही शिफ्ट हुआ था। कोतवाली में खड़े मुकदमे से संबंधित वाहन व अन्य सामान अलग-अलग थानों में रखवाया गया था।
नई जगह पर सिर्फ असलहे, उपकरण व अन्य दस्तावेजों से संबंधित साक्ष्य भेजे गए थे। सूत्रों का यह भी कहना है कि शिफ्टिंग के दौरान कई संवेदनशील और गंभीर मामलों के साक्ष्य इधर से उधर कर दिए गए।
कुछ साक्ष्य तो फेंक दिए गए। जैसे-जैसे मुकदमों में साक्ष्यों की जरूरत पड़ेगी, शिफ्टिंग की आड़ में हुए खेल सामने आते रहेंगे।
विवेचकों की मुसीबत, कोर्ट जाने से बच रहे
महिला सिपाहियों की रिश्वतखोरी के अलावा कई छोटे-मोटे मामलों के साक्ष्य गायब होने से विवेचकों के पसीने छूट रहे हैं। साक्ष्य न होने से विवेचक कोर्ट में खड़े होने की स्थिति में नहीं हैं जिनका लाभ प्रतिवादियों के वकीलों को मिल रहा है। ऐसे मुकदमों की सुनवाई की तारीख आती है तो विवेचकों के दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं।
दर्जनों मुकदमों से संबंधित साक्ष्य और कागजातों का अता-पता नहीं है। ऐसे में कोर्ट में फटकार के डर से विवेचक तारीख पर तारीख लेते जा रहे हैं।