सरकार अभी तक खामोश है जबकि बीते ढाई साल में जनता के पांच सौ करोड़ से अधिक का धन लूटा जा चुका है।
मैग्नम, टिस्का, परसिस्ट, इप्टा, वीकेयर, एपेक्स...नाम इतने कि याद रखना मुश्किल है। बीते ढाई साल में ऐसी तमाम कंपनियां जनता का 500 करोड़ से अधिक रुपया लूट ले गईं और जिम्मेदार खामोश हैं।
दर्द सिर्फ उनके चेहरे पर है जिनका पैसा ताल ठोककर लूट लिया गया। महीनों से लोग थाना-चौकी के चक्कर लगा रहे हैं।
राजधानी में मल्टी लेवल मार्केटिंग,चिटफंड और फाइनेंस कंपनी बनाकर ठगी का गोरखधंधा धड़ल्ले से चल रहा है।
डेढ़ दशक से चल रहे इस धंधे का दूसरा चरण करीब ढाई साल पहले तब शुरू हुआ जब मैग्नम और टिस्का जैसी कंपनियों की नींव रखी गई थी।
शानदार ऑफिस खोलकर लुभावने ऑफर देने वाली इन ठग कंपनियों के संचालक बीते ढाई साल में राजधानी की जनता का करोड़ों रुपया लूट ले गए।
ठगी करने वाली इन कंपनियों ने एक बार फिर कुबेर और जेवीजी की याद दिला ली। ढाई साल में गली-गली खुली 50 से ज्यादा कंपनियों ने जनता का 500 करोड़ से ज्यादा रुपया डकार लिया।
किसी ने चार साल में पैसा दोगुना करने का लालच दिया तो किसी ने प्रोडक्ट बेचने के लिए चेन बनाने का झांसा देकर ठगी की।
फाइनेंस कंपनियों की भी बाढ़ आ गई। मैग्नम कंपनी ने राजधानी सहित बाराबंकी, सीतापुर, हरदोई, प्रतापगढ़,इलाहाबाद, फैजाबाद तक के करीब 8000 लोगों से लगभग 100 करोड़ रुपये की ठगी की।
टिस्का होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड ने करीब 200 करोड़ रुपये ठगे। कंपनी ने सिर्फ राजधानी में ही 4000 लोगों की रकम डकार ली।
वी-केयर ने डेढ़ सौ से अधिक लोगों को शिकार बनाकर 30 से 50 करोड़ रुपये की रकम बनाई तो एपेक्ट ने विदेश में नौकरी का झांसा देकर बेरोजगारों से दो-चार करोड़ की ठगी की।
ऐसी कंपनियों का तो नाम-पता तक नहीं मालूम जिन्होंने जनता के 20-25 लाख दबा लिए।
कानपुर में होता है कंपनियों का रजिस्ट्रेशन
कंपनी सेक्रेटरी नीतू टंडन बताती हैं कि ऐसी कंपनियां नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनी (एनबीएफसी) कहलाती हैं।
यूपी और उत्तराखंड में काम करने वाली ऐसी कंपनियों का रजिस्ट्रेशन कानपुर स्थित रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के ऑफिस में ऑनलाइन होता है। इन कंपनियों के लिए नियम व शर्तें तय हैं।
हर अनियमितता पर भारी जुर्माने का प्रावधान है जो मूल रकम से उसका तीन गुना तक हो सकता है।
लेकिन शायद ही कोई कंपनी इनका पालन करती हो। कोई भी कंपनी निवेशकों को 12.5 प्रतिशत से अधिक ब्याज दर नहीं दे सकती।
कोई कंपनी ऐसा कर रही है तो निश्चित तौर पर नियमों का उल्लंघन हो रहा है।
चिटफंड कंपनियों का संचालन चिट फंड्स एक्ट 1982 के तहत होता है। ऐसी कंपनियां निश्चित सदस्यों से किस्तों में रकम जमा कराती हैं और 12 माह से छह साल तक की निश्चित समयावधि के बाद चिट के जरिए ड्रा निकाले जाते हैं। हालांकि,अगस्त 2009 से रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने चिटफंड कंपनियों पर जमा स्वीकार करने पर प्रतिबंध लगा दिया है।
जानकारी के अभाव में ठगे जाते हैं लोग
इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के चेयरमैन संदीप भटनागर बताते हैं कि सबसे ज्यादा ठगी के शिकार ऐसे लोग होते हैं जिन्हें जानकारी नहीं होती।
उन्होंने कहा कि अगर कोई कंपनी चार साल में पैसा दोगुना करने का ऑफर दे रही है तो समझ जाना चाहिए कि कंपनी फ्रॉड कर रही है।
ठगी करने वाली कंपनियों का पुलिस से सीधा कोई मतलब नहीं होता लेकिन इस गोरखधंधे का खेल पुलिसकर्मियों से सेटिंग करके ही होता है।
हकीकत यह है कि राजधानी में गली-गली खुली कंपनियां पुलिस की मदद के बगैर चल ही नहीं सकती। ठगी की कमाई में स्थानीय थाना की पुलिस का भी हिस्सा तय होता है।
थानों के दलालों के जरिए कंपनी संचालक पुलिस से संपर्क करते हैं। इसके बाद कंपनी के ऑफिसों पर होने वाले झगड़े-झंझट से पुलिस नजरें फेर लेती है।
कंपनी के बोरिया-बिस्तर समेटकर भागने के बाद भी पुलिस की भूमिका पीड़ितों की मदद करने के बजाए संचालकों को बचाने की रहती है।