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‘ऐसे मारो कि निशान न आएं लेकिन दर्द जान निकाल दे’

Fri, 17 Apr 2015 12:13 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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जेल से रिहा होकर अनुज घर तो लौट आया लेकिन बदला-बदला सा। जेल में बिताए 66 दिन अनुज को हमेशा याद रहेंगे। अनुज का कहना है कि, उसने इतना कुछ देख लिया कि सिस्टम से चिढ़ हो गई है।’
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उसने कहा कि पुलिस की करतूत और जेल की ऊंची-ऊंची दीवारों ने उसे सिस्टम के खिलाफ कर दिया है। अनुज ने बताया कि पुलिस ने उसे और हिमांशु को पकड़ा था तो कहीं एक कमरे में रखा। हिमांशु और उसकी पिटाई की गई।

हर आधे घंटे में दस-बारह अलग पुलिस वाले आते थे और पूछताछ करते थे। एक पुलिस अफसर गाली देते हुए कहता था, ‘ऐसे मारो कि निशान न आएं लेकिन दर्द जान निकाल दे।’ अनुज ने कहा कि वह कभी पुलिस के चक्कर में नहीं पड़ा था इसलिए घबराया था।
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हिमांशु को तो पुलिस ने बेरहमी से पीटा। हिमांशु चलने लायक भी नहीं रहा था। उसने बताया कि पुलिस ने दो दिन तक कमरे में रखने के बाद दोनों को जेल भेज दिया था। यही वजह है कि उसे सिस्टम से चिढ़ हो गई है।

अनुज ने सवाल उठाते हुए कहा कि ‘यह कैसा सिस्टम हैं जिसमें एक बेगुनाह को जेल भेजा जाता है और कोई सुनने को तैयार नहीं होता। बेगुनाही साबित होने के बाद भी जेल से बाहर निकालने में हफ्तों लग जाते हैं।’

गांव का दुलारा लौटा तो हुआ गंभीर और गुमसुम

चेहरे की मासूमियत शायद जेल की चहारदीवारियों में ही कहीं छूट गई है। उसकी चंचलता भी नहीं दिख रही। परिवारीजन भी असमंजस में हैं। पिता गंगाप्रसाद ने कहा कि, ‘अनुज अब गंभीर हो गया है या किसी उधेड़बुन में है? समझ नहीं आ रहा।’ उन्होंने कहा कि बेटा हर वक्त कुछ सोचता रहता है।

उन्होंने चिंता जताई कि कहीं वह मानसिक रूप से बीमार न हो जाए। अनुज बृहस्पतिवार दोपहर करीब डेढ़ बजे घर पहुंचा तो गुमसुम था। बहन गायत्री ने प्यार से सिर पर हाथ फिराया तो मन में दबा गुबार आंखों से फूट पड़ा।

बोला, ‘दीदी मैंने तो कभी किसी को गाली तक नहीं दी। फिर पुलिस ने मुझे झूठे आरोप में फंसाकर जेल क्यों भेज दिया?’ उसकी पीड़ा सुनकर बरामदे में बैठे रिश्तेदार और गांव के लोग एक सुर में पुलिस को कोसने लगे।

उसने बताया कि जेल में एक पल भी चैन से नहीं रहा। कई रातें उसने आंखों में काटीं। सोचता था कि पुलिस ने जबरदस्ती अपराधी बना दिया है। अब वह जेल से छूटेगा या नहीं।

जेल के भीतर गूंजते हैं पुलिस के फर्जीवाड़े के किस्से

अनुज ने बताया कि वह सोचता था कि अगर छूट गया तो समाज और परिवार के लोग उसे किस नजर से देखेंगे। अनुज ने कहा कि, ‘अपने भविष्य को लेकर वह इतना सोचता था कि सिर में दर्द शुरू हो जाता।’ अपनी बैरक के कैदियों से वह नौकरी और कैरियर को लेकर चर्चा करता था।

अनुज ने बताया कि जेल में बंद हर आदमी अपराधी नहीं है। कई पुलिस की ज्यादती और फर्जीवाड़े के शिकार हैं। उसने बताया कि जेल में शायद ही कोई ऐसा शख्स हो जिसने पुलिस के लिए अच्छे शब्दों का इस्तेमाल किया हो।

हर व्यक्ति पुलिस को बुरा-भला कहता है। जेल में पुलिस की ज्यादतियों के किस्से गूंजते हैं। अनुज ने बताया कि उसने अपनी बैरक में बंद कई लोगों की आपबीती सुनी।

एक युवक ऐसा था जिसे पुलिस ने पड़ोसियों से झगड़े के बाद ड्रग्स और अवैध असलहा रखने के आरोप में बंद कर दिया था।
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जेल में मिला भावनात्मक साथ

अनुज को जेल जाने से पहले ही वहां मौजूद लोगों का भावनात्मक साथ मिला। अखबारों और न्यूज चैनलों के जरिए जेल का स्टाफ और वहां के बंदी राजधानी पुलिस की करतूत जान चुके थे।

अनुज ने बताया कि, ‘जेल जाते ही बंदियों ने उससे पूरे मामले की जानकारी ली।’ उसने बताया कि हिमांशु दूसरी बैरक में था। बंदियों ने उसके बारे में भी पूछा। गौरी हत्याकांड की कहानी जानने के बाद बंदियों ने अनुज से कहा कि, ‘तुम निर्दोष हो। पुलिस ने फर्जी फंसा दिया है। जल्दी छूट जाओगे।’

हिमांशु की मां ने दी बधाई, पूछा बेटे का हालचाल
गौरी श्रीवास्तव की हत्या के मुख्य आरोपी हिमांशु की मां ने भी खरिका भीमटोला में अनुज के घर जाकर उसे बधाई दी। उन्होंने कहा, ‘मेरा बच्चा भी निर्दोष है। पुलिस ने उसे फंसा दिया है।

देखना वो भी जल्दी छूटेगा।’ उन्होंने अनुज से बेटे का हालचाल भी पूछा। शाम करीब सात बजे अनुज से मिलने उसके घर आईं हिमांशु की मां डेढ़ घंटे रुकीं।
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