गांवों और सार्वजनिक स्थलों से गोबर एकत्रित कर उसमें मुल्तानी मिट्टी, हल्दी और गौंद मिलाकर रंग-ब
लखनऊ। जिस गोबर को कभी केवल उपले या खाद तक सीमित समझा जाता था, वही अब महिलाओं के लिए गो-धन बन गया है। राजधानी के विभिन्न इलाकों में महिलाएं गाय के गोबर को रचनात्मकता और कौशल से जोड़कर इको-फ्रेंडली दीये, गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां और मालाएं बना रही हैं। ये महिलाएं न सिर्फ स्वदेशी की रोशनी फैला रही हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता की मिसाल भी बन रही हैं।
फैसलेंदु महिला गृह उद्योग चला रही वजीरगंज की इंदू शर्मा बताती हैं कि मलिहाबाद, इटौंजा, सरोजनीनगर और सीतापुर की करीब 30 महिलाएं इस पहल से जुड़ी हैं। वे गांवों और सार्वजनिक स्थलों से गोबर एकत्रित कर उसमें मुल्तानी मिट्टी, हल्दी और गौंद मिलाकर रंग-बिरंगे दीये और मूर्तियां तैयार करती हैं।
इन उत्पादों की कम लागत में अधिक लाभ मिलने से महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं। इंदू बताती हैं कि दीपोत्सव में करीब 15 हजार दीयों की बिक्री हुई। मूर्तियों व मालाओं को भी बाजार में जबरदस्त प्रतिसाद मिला।
g गोबर के सही इस्तेमाल की मुहिम बनी प्रेरणा : अक्सर गोबर को यूं ही फेंक दिया जाता है, लेकिन इन महिलाओं ने इसे ‘’कचरे से कंचन’’ में बदल दिया है। ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को दो से तीन दिन के प्रशिक्षण में ही दीये, मूर्तियां और मालाएं बनाना सिखाया जा रहा है। पूजा-पाठ में गाय के गोबर का धार्मिक महत्व होने के कारण इन वस्तुओं की मांग तेजी से बढ़ रही है। ज्यादातर उत्पाद ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिये बेचे जा रहे हैंैं।
गांवों और सार्वजनिक स्थलों से गोबर एकत्रित कर उसमें मुल्तानी मिट्टी, हल्दी और गौंद मिलाकर रंग-ब