वसीयत के आधार पर संपत्ति का नामांतरण मालिकाना हक नहीं देता। हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने लखनऊ के एक मामले में यह अहम व्यवस्था दी। इस मामले में एक महिला ने अपने पिता की मृत्यु से चंद घंटे पहले तैयार की गई वसीयत के आधार पर हुए नामांतरण के आधार पर संपत्ति पर कब्जा किया था। अदालत ने कहा-नामांतरण को किसी व्यक्ति के पक्ष में निर्णय या अधिकार पत्र नहीं माना जा सकता। विवादित मामलों में सक्षम न्यायालय के निर्णय को आधार बनाया जाना चाहिए।
जस्टिस महेंद्र दयाल ने यह निर्णय मीना देवी की याचिका को खारिज करते हुए दिया। अदालत ने कहा अगर याची वसीयत के आधार पर संपत्ति पर अधिकार का दावा करती हैं, तो वह सक्षम न्यायालय के पास जा सकती हैं। साथ ही तहसीलदार नामांतरण प्रक्रिया पर यथा संभव जल्द निर्णय लें।
मीना ने याचिका में दावा किया था कि पिता बाबूराम ने मौत से पहले 22 जुलाई 2000 को वसीयत की थी। वह बाबूराम की इकलौती बेटी हैं। इसी आधार पर तहसीलदार ने 29 नवंबर 2003 को तहसीलदार ने संपत्ति का नामांतरण किया। इसके खिलाफ विरोधी पक्ष ने मंडल अधिकारी के समक्ष अपील कर दी।
नवंबर 2004 को तहसीलदार को सभी पक्षों को सुनकर म्यूटेशन पर अंतिम निर्णय करने के लिए कहा गया। इसके खिलाफ मीना देवी ने लखनऊ मंडल आयुक्त के समक्ष पुनर्विचार याचिका दी। आयुक्त ने उसे खारिज कर दिया। याची का कहना था कि उनके नाम पर हुआ नामांतरण एक वाजिब वसीयत पर आधारित है, ऐसे में मंडल अधिकारी और आयुक्त के निर्णय गलत है, इसे रद्द किया जाना चाहिए।
संदेहास्पद मामला : सुबह वसीयत हुई, दोपहर को पिता की मृत्यु
सुनवाई के दौरान सामने आया कि मंडल अधिकारी व आयुक्त के निर्णयों में वसीयत को संदेहास्पद बताया गया था। सामने आए तथ्यों के अनुसार, याची के पिता बेहद बीमार थे। सुबह वसीयत की गई और उसी दिन दोपहर में बाबूराम की मृत्यु हो गई। इसी वजह से तहसीलदार को नामांतरण के लिए फिर से मामले की जांच के लिए भी कहा गया।