इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा के मामले में घटना की रिपोर्ट (डीआईआर) के बिना भी निचली अदालत अंतरिम आदेश, अंतिम आदेश और नोटिस जारी कर सकती है। यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकल पीठ ने ममता की याचिका पर पारित किया।
याचिका में कहा गया था की याची ने निचली अदालत में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत परिवाद दायर किया था। इस पर अदालत ने संरक्षण अधिकारी से घरेलू घटना की रिपोर्ट (डीआईआर) तलब किया और मामले की अगली तारीख तय कर दी। अगली तिथि पर डीआईआर रिपोर्ट न आने के आधार पर बजाय अंतरिम आदेश व प्रतिवादियों को नोटिस देने के अदालत ने पुन: डीआईआर तलब की।
कोर्ट ने निचली अदालत के इस आदेश को खारिज करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ऐसे मामले में यह व्यवस्था दे चुका है कि जिन मामले में संरक्षण अधिकारी नियुक्त नहीं है और जब पीड़ित द्वारा खुद ही घरेलू हिंसा का परिवाद दाखिल किया गया हैं तो निचली अदालत ऐसे किसी भी रिपोर्ट पर विचार करने के लिए बाध्य नहीं है। ऐसे में निचली अदालत बिना डीआईआर के भी याची के परिवाद निर्णित कर सकता है।