छोटे चौधरी आजकल दुविधा में फंसे हैं। पार्टी से किनारा करने वाले दो सांसदों को निलंबित करने के बाद भी उनकी दिक्कतें कम होती नहीं दिख रहीं। असली समस्या बेस वोट बैंक को संभाले रखने की है।
उनका आधार वोटर केंद्रीय सेवाओं में ओबीसी का आरक्षण दिए जाने का प्रबल समर्थक है। कांग्रेस है कि इस मांग पर गोली पर गोली दिए जा रही है।
पांच सांसदों के साथ यूपीए में शामिल होकर जब उड़ने वाले महकमे की कमान संभाली तो समर्थकों को यह कहकर दिलासा दी कि अब केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण ज्यादा दूर की कौड़ी नहीं है।
विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण मिलने की चर्चा चली। चुनाव को भी 16 महीने बीत गए, लोकसभा चुनाव सिर पर आने को है लेकिन आरक्षण पर निर्णायक फैसले की घड़ी नजदीक आती नहीं दिख रही।
दुविधा इसी मुद्दे पर है। हाईकोर्ट बेंच पर दशकों से आश्वासनों के जरिये उम्मीदें जगाने वाले चौधरी साहब आरक्षण पर लंबे समय तक ऐसा करने की स्थिति में नहीं है। जोखिम है कि आरक्षण में ज्यादा देरी होने पर कही चौधरी लोग भड़क न उठे।