फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मोदी ने की तारीफ पर यूपी में दम तोड़ रही है मनरेगा

Thu, 04 Feb 2016 12:33 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
विज्ञापन
सूबे में महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) की हालत खस्ता है। एक ओर केंद्र से मिलने वाले धन में यूपी का हिस्सा साल-दर-साल घटता जा रहा है तो दूसरी ओर प्रदेश की मशीनरी पूरा बजट खर्च नहीं कर पाती है।
विज्ञापन


हालांकि सिर्फ 2014-15 में ही उपलब्ध बजट से ज्यादा धन खर्च किया गया। चार साल पहले से तुलना करें तो मनरेगा का बजट आधा रह गया है। ऐसे में तो प्रदेश में मनरेगा ही दम तोड़ देगा।

मनरेगा में सबसे बुरी स्थिति ग्राम रोजगार सेवकों की है। दरअसल, इन्हें मानदेय का भुगतान संबंधित ग्राम पंचायत में मनरेगा के बजट के खर्च होने वाले धन की तीन फीसदी राशि से किया जाता है। पर, जब काम नहीं होता है तो धन भी खर्च नहीं हो पाता। नतीजतन रोजगार सेवकों व अन्य कर्मचारियों को भुगतान में समस्याएं आती हैं।
विज्ञापन


सिर्फ ग्राम रोजगार सेवकों को ही ले लें तो प्रदेश के लगभग 40 हजार ग्राम रोजगार सेवकों को लगभग तीन साल से हर महीने मानदेय का भुगतान नहीं हो पा रहा है। हाल में राज्य सरकार ने इन रोजगार सेवकों व अन्य कर्मियों के भुगतान के लिए 300 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं।

नियमित भुगतान के लिए सलाना 45 लाख के काम हों

ग्राम रोजगार सेवकों का मानदेय न्यूनतम 3630 रुपये प्रतिमाह नियत किया गया है। नियमित रूप से इसके भुगतान के लिए साल भर में उस ग्राम पंचायत में लगभग 45 लाख रुपये का काम होना चाहिए।

पर, पिछले कुछ वर्षों के दौरान काम की जो रफ्तार रही है, उसके चलते ज्यादातर ग्राम पंचायतों में इतना काम ही नहीं हो पाता।

ग्राम रोजगार सेवक संघ के प्रभारी कमलेश गुप्त की मानें तो इसके लिए कहीं-कहीं भौगोलिक रूप से ग्राम पंचायतों का छोटा होना तो ज्यादातर जगह धन के अवांटन में जिला स्तर पर सरकारी मशीनरी की मनमानी भी जिम्मेदार है।
विज्ञापन

काम न होने से केंद्रीय बजट में कटौती

मनरेगा के तहत समय के धन न आने के कारण भी पंचायतों में नियमित रूप से काम नहीं हो पाते और ग्राम रोजगार सेवकों का भुगतान रुकता है। हालांकि अन्य पदों के मानदेय का भुगतान जिला व ब्लॉक स्तर पर खर्च कुल धन के निर्धारित प्रतिशत से होना होता है, इसलिए ग्राम रोजगार सेवकों जितनी समस्याएं नहीं आती हैं।

पर, भुगतान उनका भी नियमित नहीं हो पा रहा है। काम न होने के कारण केंद्र से प्रदेश को मिलने वाले बजट की भी कटौती हो जाती है।

बीते पांच वर्षों का हाल
वित्तीय वर्ष--कुल बजट--खर्च (करोड़ रुपये में)
2011-12--6718--5103
2012-13--2937--1967
2013-14--4072--3460
2014-15--2957--3137
2015-16--2692--2565 (अब तक)
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें