एक के बाद एक लाल दुर्ग ढहने से वाम पार्टियों के अंदर ही सवाल उठने लगे हैं। माकपा व भाकपा समेत वाम मोर्चे में शामिल पार्टियों के एक धड़े का मानना है कि संघर्ष छोड़कर चुनावी राजनीति में ही फंसकर रह जाने से यह हश्र हुआ है।
अब नए सिरे से जमीन तैयार करने के लिए फिर से जनांदोलन खड़े करने होंगे। इसके लिए पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं का नेटवर्क भी बनाना होगा।
पश्चिम बंगाल के बाद त्रिपुरा में भी वाम सत्ता का अंत कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। चौदहवीं लोकसभा में माकपा व भाकपा समेत वाम मोर्चे के पास कुल 62 सीटें थीं, जो वर्ष-2009 के चुनाव में घटकर 22 रह गईं।
पिछले लोकसभा चुनाव में तो वाम मोर्चे में शामिल माकपा, भाकपा व आरएसपी महज 11 सीटों पर सिमट गईं। माकपा के एक नेता कहते हैं, हम लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं, लेकिन नेतृत्व इसके ठोस कारणों तक या तो पहुंचना नहीं चाह रहा है या फिर सब कुछ जानते हुए भी अनजान बना है।
पिछली सदी में 60 और 70 के दशक के संघर्ष से पैदा हुई फसल को अभी तक काट रहे थे। नई फसल तैयार करने की कोशिश ही नहीं की गई, जिसका परिणाम अब सामने आ रहा है।
वाम पार्टियों के एक धड़े का मानना है कि उनका शीर्ष नेतृत्व सुविधाभोगी राजनीति का आदी हो गया है। वे मैदान में संघर्ष करते हुए नहीं दिख रहे हैं, इसलिए युवा कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा स्रोत भी नहीं बन पा रहे हैं।
जबकि, इससे पहली पीढ़ी के नेता छोटे-छोटे आंदोलनों में भी कार्यकर्ताओं व सदस्यों के साथ खड़े दिखते थे। हालांकि, भाकपा के सचिव अतुल अन्जान इससे इत्तफाक नहीं रखते।
वह कहते हैं कि त्रिपुरा में माकपा को भाजपा से सिर्फ 6 हजार वोट कम मिले। वहां कांग्रेस ढंग से नहीं लड़ी। इसलिए वाम मोर्चा हारा।