आजाद भारत में पहली बार किसी कॉमर्शियल स्ट्रीट का विकास नियोजित तरीके से लखनऊ में होगा। विदेशी निवेशकों के बजट से 21 किमी. लंबे ग्रीन कॉरिडोर को कॉमर्शियल स्ट्रीट के रूप में विकसित किया जाएगा।
इसमें शॉपिंग से लेकर मनोरंजन और शाम-ए-अवध का विकल्प दिया जाएगा। प्रोजेक्ट में निवेश के लिए एलडीए दुनिया के शीर्ष फंड मैनेजर कंपनियों ब्रुकफील्ड और ब्लैकस्टोन के संपर्क में है। यह पूरी कवायद इक्विटी सहभागिता के आधार पर होगी।
एलडीए के सचिव पवन गंगवार का कहना है कि मुख्यमंत्री के आदेश पर दूसरे विभागों से जमीन लेकर उनका विकास किया जाना है। इससे होने वाली आय से ग्रीन कॉरिडोर बनना है।
इसके लिए शुरूआती निवेश फंड मैनेजर कंपनियां उपलब्ध कराएंगी। यह फंड विदेशी निवेशकों से आएगा, जिसमें सिंगापुर सरकार के पेंशन फंड आदि शामिल हैं।
इसके बाद जमीनों के व्यावसायिक उपयोग से होने वाली आय से रिटर्न निकलेगा। इस आय में यूपी शासन और एलडीए का भी हिस्सा रहेगा। इसके लिए एलडीए ने मुख्य सचिव आरके तिवारी के सामने प्रस्ताव रखा है।
आजाद भारत में नहीं बनी कोई कॉमर्शियल स्ट्रीट
ग्रीन कॉरिडोर की पीआईयू के वास्तुविद विशेषज्ञ मेहर सिंह का कहना है कि देश में अभी ब्रिटिश काल की हीं बनी कॉमर्शियल स्ट्रीट हैं। लखनऊ में हजरतगंज भी ब्रिटिश काल की ही तैयार कॉमर्शियल स्ट्रीट है। ऐसे में ग्रीन कॉरिडोर के आसपास तैयार कॉमर्शियल स्ट्रीट आधुनिक भारत के परिदृश्य में भी महत्वपूर्ण और पहली होगी। कोशिश है कि कॉमर्शियल स्ट्रीट नो मोटर व्हीकल जोन की तरह रहे। केवल पैदल या साइकिल वालों को ही अनुमति रहे।
5000 करोड़ के निवेश की जरूरत
ग्रीन कॉरिडोर और इसके आसपास की जमीनों पर कॉमर्शियल स्ट्रीट तैयार करने के लिए करीब 5000 करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी। इसे जुटाने पर काम अब शुरू होगा। इसके लिए एलडीए को कैबिनेट मंजूरी का इंतजार है। वहीं, प्रोजेक्ट सलाहकार टाटा कंसल्टेंट्स इंजीनियर्स को कहा गया है कि संभावित निवेशक और कॉमर्शियल स्ट्रीट में कारोबार शुरू करने की इच्छुक कंपनियों को चिह्नित कर लिया जाए।
जमीन बेचने नहीं, रेवेन्यू मॉडल को प्राथमिकता
प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटेशन यूनिट (पीआईयू) की ओर से शासन को दी गई सलाह में कहा गया है कि अभी तक काश्तकार या दूसरी संस्थाओं से जमीन लेकर बेच दिया जाता था। इससे काश्तकारों की न्यूनतम कीमत में ली गई जमीन से निवेशक पूरी जिंदगी कमाई करता है। नए मॉडल में अब इक्विटी पार्टनर की मदद से जमीनों को विकसित किया जाएगा। स्पेशल परपज व्हीकल (एसपीवी) बनाकर इन जमीनों का व्यावसायिक उपयोग कराया जाए। इससे एक रेवेन्यू मॉडल विकसित होगा और विकास प्राधिकरण व इक्विटी पार्टनर की नियमित आय बनी रहेगी। विकास प्राधिकरण को मिलने वाले इस बजट से शहर में दूसरे विकास कार्य कराए जा सकते हैं।
पहले चरण के लिए चार जमीनों पर सहमति
मुख्य सचिव के सामने मंगलवार को प्रजेंटेशन के बाद चार जमीनों को लेकर सहमति बनी। इसमें नगर निगम की अपट्रॉन की 4.30 हेक्टेयर जमीन, समाज कल्याण की पारा भपटामऊ में 21 हेक्टेयर जमीन, नजूल विभाग की कॉल्विन कॉलेज में मेट्रो यार्ड की 11.50 हेक्टेयर जमीन शामिल है। इस 36.80 हेक्टेयर जमीन की मौजूदा कीमत करीब 623.90 करोड़ रुपये है। इसका विकास कर पहले भाग के लिए जरूरी बजट की व्यवस्था की जा सकेगी। वहीं एलडीए ने शासन से प्रोजेक्ट पर काम शुरू करने के लिए 100 करोड़ रुपये की मांग तुरंत की है। मुख्य सचिव ने आवास विभाग को इसके लिए जरूरी व्यवस्था कराने के लिए कहा है।
ग्रीन कॉरिडोर के लिए 32 बीघा जमीन दे रहा नगर निगम
नगर निगम की सीमा में आए 88 गांवों की 32 बीघा जमीन नगर निगम ग्रीन कॉरिडोर के लिए दे रहा है। इसे लेकर प्रस्ताव बन गया है और एक-दो दिन में महापौर के अनुमोदन के बाद डीएम को भेज दिया जाएगा। कुछ और जमीन की स्टेट्स रिपोर्ट भी भेजी जा रही है। ऐसी सरकारी जमीनों की तलाश हो रही है, जिनसे गोमती तट पर ग्रीन कॉरिडोर बनाने के लिए बजट जुटाया जा सके। शासन स्तर पर इस नीति के बाद डीएम ने नगर निगम से जमीन मांगी थी। इस पर सरोजनीनगर तहसील क्षेत्र में आने वाले विस्तारित क्षेत्र के गांव अरदौनामऊ की 32 बीघा जमीन चिह्नित की गई है। नगर निगम सीमा में होने से डीएम पहले इस जमीन का पुनर्गठन करेंगे। इसके बाद इसे कॉरिडोर निर्माण से जुड़े विभाग को देंगे। नगर निगम की ओर से और जिन जमीनों के बारे में रिपोर्ट भेजी जा रही है, उसमें गोमती नगर में अपट्रॉन इंडिया की और इसके पीछे की जमीन शामिल है। अपट्रॉन इंडिया की जमीन का विवाद सर्वोच्च न्यायालय में है और उसके पीछे की भूमि सिंचाई विभाग के पास है।