एक ही नस्ल के दो जानवरों को आपस में बराबरी से लड़ते हुए देखने का शौक पुराने बादशाहों में बहुत पहले समय से ही चला आ रहा था।
लेकिन लखनऊ के नवाबों ने इस तरह के शौक में एक ऐसी कड़ी जोड़ दी, जो इस शहर की नायाब पहचान बन गई।
नवाबों ने एक अनूठी शुरआत करते हुए जानवरों की जगह न सिर्फ परिंदों की कुश्तियां कराईं बल्कि उन पर बाजियां भी लगाईं।
वैसे इस दिलचस्प खेल की शुरुआत के पीछे एक दिलचस्प किस्सा भी जुड़ा है। जानकारों की मानें तो नवाबों के दस्तरख्वान के लिए चिड़ियां पाल कर रखी जाती थीं।
उन चिड़ियों की सेहत ठीक रखने के लिए रसोइए इन्हें चोरी छिपे आपस में लड़ाया करते थे। नवाबों को इसमें दिलचस्पी आई और कुछ इस तरह ये तमाशा उनके शौक में शुमार हो गया।
इहितासकार योगेश प्रवीण अपनी किताब 'आपका लखनऊ' में लिखते हैं कि नवाबी काल में जोफनो नाम का एक प्रसिद्ध विदेशी चित्रकार हुआ है।
उसकी पेंटिंग 'कर्नल मोरडांट की मुर्गबाजी' अपने विषय और प्रस्तुतिकरण के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। कहते हैं अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के बाद भी मुर्ग़बाज़ी का शौक लखनऊ के रईस लोगों में चलता रहा और आज भी यह कमोबेस बरकरार है।
लड़ाकू मुर्गों में असील मुर्ग बड़े जांबाज और दमदार होते हैं। कहते हैं इनकी चोंच चाकू से तराशी जाती है। बात लखनऊ के मशहूर मुर्ग़बाज़ी की करें, तो इसमें नूरबाड़ी के नवाब घसीटा, ड्योढ़ी आग़ामीर के नजीर अली खां और वजीरगंज के मुगल साहब का नाम लिया जा सकता है।
आज भी शहर के नक्खास, ठाकुरगंज, सआदतगंज जैसे इलाकों में मुर्ग़बाजों की रिहाईश है और वे गाहे-बगाहे अपना यह करतब दिखाते रहते हैं।