प्रत्येक शारदीय नवरात्र भर गोरखनाथ मंदिर के सिर्फ एक कक्ष में एकांत में रहकर आदिशक्ति जगदंबा की साधना करने वाले योगी आदित्यनाथ इस बार शायद ‘अजपा’ विधि से मॉं की आराधना करेंगे।
यह तो नहीं स्पष्ट है कि वह नवरात्र भर कहां रहेंगे लेकिन उन्होंने जो कुछ बताया उससे ऐसा ही लगता है कि अब तक की साधना पद्धति में वह इस बार कुछ बदलाव करेंगे। उन्होंने इस तैयारी को ‘अमर उजाला’ से साझा की।
योगी को शायद पता है कि अब वह सिर्फ गोरखपुर के सांसद और गोरक्षपीठ के महंत भर नहीं हैं। इसलिए अब उन्हें शारदीय नवरात्र में एकांतवास करके पूरा समय साधना में लगाने की सहूलियत प्राप्त नहीं हो।
उन पर अब मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी हैं। कभी कोई ऐसी आकस्मिक परिस्थिति खड़ी हो सकती है जिसमें उनके अपने निजी जीवन की गतिविधियों का हिस्सा राजधर्म के कर्तव्यों के निर्वहन में समस्या बन सकता है।
अभी तक यह रहता था क्रम
वैसे तो योगी का अध्यात्म से गहरा नाता है। प्रात: काल लगभग दो घंटा पूजा और आराधना योगी आदित्यनाथ की दैनिक दिनचर्या का हिस्सा है। पर, नवरात्र का उनके लिए विशेष महत्व रहा है।
इस दौरान वह विशिष्ट साधना करते हैं। खासतौर से शारदीय नवरात्र में अभी तक वह पूरे नवरात्र भर गोरखनाथ मंदिर के एक कक्ष में ही रहकर साधना करते रहे हैं।
सुबह से रात्रि तक सिर्फ दुर्गासप्तशती का पाठ, चंडी पाठ और मंत्रजप करते थे।
पूरे नवरात्र उपवास रखने वाले योगी आदित्यनाथ अभी तक शारदीय नवरात्र में अष्टमी तिथि को साधना कक्ष से बाहर आकर छोटी बालिकाओं को देवीस्वरूप मानकर उन्हें मंदिर में बुलाकर थाली में उनके पैर धोते थे।
पैर धोने और उनका पूजन करने के बाद हवन और फिर बालिकाओं को भोजन कराने के बाद वह मंदिर की गायों को अपने हाथ चारा खिलाते थे और बाद में वह पारण अर्थात अन्न ग्रहण कर नवरात्र का उपवास तोड़ते थे। पर, मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी होने के नाते शायद इस बार ऐसा संभव न हो पाए।
ऐसे पूरी करेंगे नवरात्र साधना
मुख्यमंत्री ने बताया कि वह चैत्र और शारदीय दोनों में पूरे नवरात्र भर अपवास रखते हैं। नवरात्र २१ सितंबर से प्रारंभ हो रहे हैं। इस बार भी पूरे नवरात्र भर उपवास रखूंगा। समस्त साधना और पूजा चलती रहेगी।
सामान्य व्यक्ति के लिए पूजा एक माध्यम है। पर, साधना की उच्च स्थिति प्राप्त होने के बाद मानस पूजा की जा सकती है। यह साधना की एक विशिष्ट प्रक्रिया है। जिसे कोई व्यक्ति बैठे-बैठे पूरी कर सकता है।
वह कहते हैं, गुरु गोरखनाथ जी ने साधना की एक ऐसी विधि बताई है, जिसे ‘अजपा’ कहते हैं। इसमें अपने ईष्ट (देवता) का ध्यान करते हुए उसे श्वांस से जोड़ लेते हैं तो फिर अलग से साधना की जरूरत नहीं रहती। व्यक्ति काम भी करता रहता है और साधना भी होती रहती है। बाकी सामान्य पूजा-पाठ चलती रहेगी।