मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ धान खरीद, अनाज वितरण, अवैध खनन रोकने जैसे प्रमुख मुद्दों पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर अफसरों को बार-बार ठीक से काम की हिदायत देते रहे। मुख्य सचिव और विभागीय प्रमुख सचिव शासनादेश जारी कर निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन के आदेश थमाते रहे।
गोंडा और फतेहपुर से शिकायतें आने पर सरकार ने बड़े अफसरों को सुधरने की मोहलत देते हुए छोटे अफसरों पर कार्रवाई भी की। मुख्यमंत्री जिले में गए तो गड़बड़ियों वाले क्षेत्रों को इंगित कर सुधार के लिए चेताया, मगर जिले के आला अफसरों ने इस पर कान नहीं दिया।
राशन माफिया, खनन माफिया, बिचौलियों का धंधा बेधड़क चलता रहा। लोग परेशान रहे। अफसर अपनी कुर्सी बचाने के लिए स्थानीय प्रभावशाली नेताओं की जी-हुजूरी में जुटे रहे। उनकी मनमानी के आगे नतमस्तक तक हो गए। नतीजा ये हुआ कि अगली शिकायत जांच-पड़ताल में तस्दीक हुई तो मुख्यमंत्री ने कलेक्टरों तक के निलंबन में हिचकिचाहट नहीं दिखाई।
दरअसल मुख्यमंत्री को पिछले साल अक्तूबर में गोंडा में बड़े पैमाने पर अवैध खनन की शिकायतें मिली थीं। डीएम जेबी सिंह ही थे। मुख्यमंत्री ने डीएम और तत्कालीन एसपी को चेतावनी दी और तीन थानाध्यक्षों व एक खान निरीक्षक को निलंबित कर दिया।
दो-दो तहसीलों के एसडीएम व सीओ के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू कराई। इतने सख्त एक्शन के बावजूद जिले में अवैध खनन नहीं रुका। जिले के जनप्रतिनिधि मुख्यमंत्री व शासन के अफसरों से मिलकर जिले में प्रशासनिक शिथिलता व विभिन्न योजनाओं व कार्यक्रमों में मनमानी की शिकायतें करते आ रहे थे। सरकारी अनाज की कालाबाजारी का मामला सामने आया तो सरकार ने सख्त कार्रवाई में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई।
इसी तरह पिछले साल दिसंबर में फतेहपुर में अवैध खनन व परिवहन की जानकारी सरकार को मिली। डीएम कुमार प्रशांत ही थे। शासन ने परगना अधिकारी, सीओ खागा, धाता के एसएचओ व खान अधिकारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया था।
अवैध खनन पर प्रभावी कार्रवाई न किए जाने पर डीएम व एसपी से स्पष्टीकरण तलब हुआ, पर फतेहपुर से अवैध खनन की शिकायतें रुक नहीं रही थीं। सरकार को गेहूं खरीद में भी जिले में मनमानी की शिकायत मिली तो जांच के बाद निलंबित करने में देर नहीं लगाई।