माटीकला महोत्सव में मिट्टी के बर्तनों के साथ सर्वोत्तम तिवारी।
लखनऊ। आधुनिकता के दौर में घरों की रसोई भले ही मॉड्यूलर हो रही हैं लेकिन उनमें मिट्टी के बर्तनों की जगह भी बढ़ रही है। पारंपरिक मिट्टी के बर्तन अब नए डिजाइन और बेहतर फिनिशिंग के साथ लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। इसी कारण इनकी मांग तेजी से बढ़ रही है। खादी भवन में चल रहे माटीकला महोत्सव में मिट्टी के कुकर और कड़ाही जैसे बर्तनों को भी काफी पसंद किया जा रहा है।
कोविड के दौरान शुरू किया काम, अब बढ़ रही मांग
कानपुर से आए सर्वोत्तम तिवारी ने महोत्सव में मिट्टी के बर्तनों का स्टॉल लगाया है। उन्होंने बताया कि कोविड के दौरान उन्होंने मिट्टी के बर्तन बनाने का काम शुरू किया था। इन बर्तनों को टेराकोटा भी कहा जाता है। इन्हें लाल मिट्टी, पीली मिट्टी और क्ले के मिश्रण से तैयार किया जाता है। इसके बाद इलेक्ट्रिक भट्टी में उच्च तापमान पर पकाया जाता है और फिर इनकी फिनिशिंग की जाती है। सर्वोत्तम के मुताबिक, भट्टी में पकाने की प्रक्रिया से बर्तन मजबूत बनते हैं और आंच सहन कर पाते हैं।
इस्तेमाल से पहले बरतें ये सावधानियां
मिट्टी के बर्तन इस्तेमाल करते समय अक्सर उनके चटकने या टूटने की शिकायत आती है। सर्वोत्तम बताते हैं कि इसके लिए कुछ सावधानियां जरूरी हैं। खरीदने के बाद बर्तन को इस्तेमाल से पहले एक रात पानी में डुबोकर रखना चाहिए। इसके बाद सरसों के तेल और हल्दी का लेप लगाकर कोटिंग करनी चाहिए। गैस या चूल्हे पर बर्तन रखते समय शुरुआत में आंच धीमी रखें। बर्तन गर्म होने के बाद जरूरत के अनुसार आंच बढ़ाई जा सकती है। इन सावधानियों से बर्तनों की उम्र बढ़ाने में मदद मिलती है।
अवन में भी कर सकते हैं इस्तेमाल
मिट्टी के बर्तनों की बढ़ती मांग का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि महोत्सव शुरू होने के चार दिन के भीतर ही सर्वोत्तम के स्टॉल पर कुकर और कड़ाही जैसे बर्तनों का स्टॉक खत्म हो गया। इसके लिए उन्हें अलग से माल मंगाना पड़ा। सर्वोत्तम के मुताबिक, जिन बर्तनों में मिट्टी के अलावा कोई अन्य सामग्री, जैसे हैंडल या एक्सेसरीज नहीं लगी हैं, उन्हें अवन में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।