अनुराग बाजपेईलखनऊ। आज भले ही देश में फुटबॉल का जिक्र होते ही सबसे पहले कोलकाता का नाम लिया जाता हो, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब लखनऊ का सिटी क्लब राष्ट्रीय फुटबॉल में अपनी अलग पहचान रखता था। सत्तर के दशक में सिटी क्लब देश के शीर्ष आठ फुटबॉल क्लबों में गिना जाता था और मैदान पर उसका ऐसा दबदबा था कि मोहन बागान, ईस्ट बंगाल और मोहम्मडन स्पोर्टिंग जैसी दिग्गज टीमें भी उसके खिलाफ मुकाबले में पूरी तैयारी और दमखम के साथ उतरती थीं।
लखनऊ के पहले अंतरराष्ट्रीय फुटबॉलर कैसर मिर्जा के बाद सिटी क्लब ने कई ऐसे खिलाड़ी दिए, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर क्लब की प्रतिष्ठा को बनाए रखा। उस समय लखनऊ फुटबॉल एसोसिएशन के सचिव मिर्जा कासिम हुसैन ने सिटी क्लब को नई पहचान दी। उनके निर्देशन में नवाब हादी, सल्ली, मेहंदी अब्बास, विवेक सिंह, सीजे थापा, विजय थापा, मो. तकवी, माता प्रसाद, मान सिंह, एसएस कुशवाहा और सिराज हुसैन जैसे खिलाड़ियों ने लंबे समय तक सिटी क्लब को देश के शीर्ष क्लबों में बनाए रखा।
कैसर मिर्जा की तो बात ही निराली थी
सिटी क्लब के स्टार स्ट्राइकर कैसर मिर्जा अपनी तेजतर्रार खेल शैली और गोल करने की क्षमता के लिए जाने जाते थे। प्रतिद्वंद्वी टीम को अक्सर अंदाजा ही नहीं लग पाता था कि वह कब गोल दाग देंगे। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मोहम्मडन स्पोर्टिंग और मोहन बागान जैसे प्रतिष्ठित क्लबों ने उन्हें अपनी ओर से खेलने का न्योता दिया। वर्ष 1940 के आसपास कैसर मिर्जा एक बेहतरीन फुटबॉलर के रूप में उभरे। उन्होंने भारतीय टीम की ओर से पाकिस्तान के खिलाफ अपने अंतरराष्ट्रीय कॅरिअर की शुरुआत की। इसके बाद वह करीब दस वर्षों तक लखनऊ के सिटी क्लब के कप्तान रहे। अपने लंबे कॅरिअर में उन्होंने यूपी की ओर से आईएफए कप (कोलकाता), डूरंड कप (दिल्ली), रोवर्स कप (मुंबई), आमंत्रण कप (जयपुर), कोलकाता लीग और संतोष ट्रॉफी जैसे प्रतिष्ठित टूर्नामेंटों में भाग लिया। मिर्जा ने लंबे समय तक मोहम्मडन स्पोर्टिंग के लिए खेला और बाद में कुछ वर्ष मोहन बागान टीम के साथ भी बिताए।
मुझे आज भी याद है कि जब पुलिस लाइन में सिटी क्लब की टीम अभ्यास करती थी तो मैं गेंद उठाकर खिलाड़ियों को देता था। यहीं से मैंने इस खेल का अपना लिया। अपने कॅरिअर के शुरुआती दिनों में लखनऊ के बड़े खिलाड़ियों के बीच रहा। बाद में स्पोर्ट्स कोटे के आधार पर मुझे पोस्टल विभाग में नौकरी मिली और आज भी सचिव के रूप में लखनऊ के फुटबॉल से जुड़ा हुआ हूं।
- कन्हैया लाल (सचिव, जिला फुटबॉल एसोसिएशन)