उत्तर प्रदेश में बाल विवाह के मामले में तेजी से सुधार हो रहा है। श्रावस्ती, सिद्धार्थनगर, ललितपुर को छोड़कर अन्य जिलों में नाममात्र के बाल विवाह हो रहे हैं। राष्ट्रीय परिवार सर्वेक्षण छह की रिपोर्ट इसकी गवाही दे रही है।
उत्तर प्रदेश में लगातार चलाए जा रहे जागरूकता अभियान का नतीजा है कि अब अभिभावक भी बेटियों की शादी के बजाय पढ़ाई पर ध्यान दे रहे हैं। इसकी वजह महिलाओं के सशक्तिकरण से जुड़े अन्य संकेतकों में आए भारी उछाल के रूप में भी देखा जा रहा है। इसका सीधा असर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (2023-24) की रिपोर्ट में दिख रहा है।
ये भी पढ़ें - विधान परिषद चुनाव: सभी 11 सीटें जीतना चाहती है भाजपा, शामिल हो सकते हैं शर्मा के गुट के प्रदेश अध्यक्ष सहित ये बड़े नेता
ये भी पढ़ें - आंधी और बारिश से प्रदेश में चार मौतें, आज इन 63 जिलों में तेज आंधी चलने का अलर्ट; सीएम ने दिए निर्देश
इस बार लड़कियों के बाल विवाह के मामले 2.1 प्रतिशत अंकों की गिरावट के साथ 13.7 फीसदी पर आ गए हैं। खास बात यह है कि राष्ट्रीय औसत 20.1 है। उत्तर प्रदेश में यह वर्ष 2015-16 में 21.1 फीसदी और वर्ष 2019-21 के बीच 15.8 फीसदी था। इसी तरह पुरुषों में बाल विवाह (25-29 वर्ष के पुरुष जिनका विवाह 21 वर्ष से पहले हुआ) पहले 23 फीसदी था, जो गिरकर 19.5 फीसदी पर आ गया है।
अभी भी टॉप पर ललितपुर: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 5 में बाल विवाह के मामले में सबसे खराब स्थिति बुंदेलखंड के ललितपुर जिले की थी। यहां 42 फीसदी लड़कियों का विवाह कम उम्र होता था, लेकिन अब यह आंकड़ा घटकर 40 फीसदी पर आ गया है। इसी तरह बलरामपुर में बाल विवाह की दर 37.2 फीसदी थी, जो अब 35 पर आ गई है। श्रावस्ती में 34.2 फीसदी से घटकर 24 फीसदी पर आ गया है। गोंडा में 24.5 से घटकर 20 फीसदी पर आ गया है।
चिंताजनक पहलू: इस बार के सर्वे में एक विरोधाभासी और चिंताजनक पहलू भी सामने आया है। एक तरफ बाल विवाह के आंकड़े बेहतर हुए हैं तो दूसरी तरफ किशोरी गर्भावस्था में उछाल आया है। एनएफएचएस 5 में 15-19 वर्ष की लड़कियों में गर्भावस्था या मां बनने की दर घटकर 2.9 फीसदी पर आ गई थी, लेकिन एनएफएचएस 6 में यह आंकड़ा दोबारा बढ़कर 3.5 फीसदी हो गया है। इससे साफ है कि अभी भी लड़कियों की सुरक्षा, ड्रॉप-आउट रोकने और स्वास्थ्य जागरूकता पर विशेष फोकस बनाए रखने की जरूरत है।
पूर्व महानिदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य डॉ. बद्री विशाल का कहना है कि प्रदेश में शिक्षा का ग्राफ बढ़ा है। जागरुकता आई है। गांवों में चिकित्सा सुविधाएं भी बढ़ी हैं। ऐसे में कम उम्र में शादी होने का चलन लगातार घट रहा है। जहां तक कम उम्र में गर्भावस्था की बात है तो इस पर स्वास्थ्य विभाग को नए सिरे से काम करना होगा।