आगे लिखा है- संवाददाता (संवादाता), संवाद सूत्र, रिपोर्टर और पत्रकारों का बिना अधीक्षक, अनुमति के चिकित्सालय परिसर में प्रवेश वर्जित है। यहां जो वर्गीकरण है उससे साफ हो जाता है कि सीएचसी प्रभारी को असली पीड़ा पत्रकारों से है।
कभी इन पर भी तो नोटिस चस्पा किया होता
सीएचसी में डॉक्टरों और दवाओं की कमी है। प्रसूता के इलाज में लापरवाही के मामले आते रहते हैं। मरीजों के खाने में अनियमितताएं, साफ-सफाई व्यवस्था बदहाल है। पर, इन सब पर सीएचसी प्रभारी नोटिस नहीं चस्पा करातीं।
कहीं पर निगाहें...कहीं पर निशाना, नोटिस तो सिर्फ बहाना
जाहिर है कि समस्याओं का समाधान करने के बजाय सीएचसी अधीक्षक उन्हें छिपाने का प्रयास करती हैं। इसलिए सीधे पत्रकारों का प्रवेश वर्जित करतीं तो सवाल उठता, इसलिए पहले दो शब्द जोड़े-फालतू व्यक्ति।
नोटिस पर लोग सवाल कर रहे हैं। उनका कहना है कि अधीक्षक ने कभी निजी अस्पतालों के दलालों पर भी तो शिकंजा कसा होता। कर्मचारी भी इसे दबी जुबान में मानते हैं कि निजी अस्पतालों के दलालों की पहुंच अस्पताल परिसर तक है। ये दलाल फार्मासिस्ट रूम, अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे रूम समेत वार्डों में घूमा करते हैं। अब ये कथा सुनाने तो आते नहीं होंगे।
हमारा पक्ष नहीं लिया, इसलिए लगाई रोक
मेरा पक्ष जाने बगैर एक जून को खबर प्रकाशित हुई थी। इसलिए यह नोटिस चस्पा कराया गया।
डॉ. ज्योति कामले, अधीक्षिका, सीएचसी काकोरी
प्रभारी से जवाब तलब किया है
मामले की शिकायत आई थी। सीएचसी प्रभारी से नोटिस हटाने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं सीएचसी प्रभारी को इस तरह का नोटिस चस्पा कराने पर जवाब मांगा गया है।
डॉ. नरेंद्र अग्रवाल,सीएमओ