जानकार बताते हैं कि बसपा सुप्रीमो वपूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने दलित एजेंडे पर मजबूत पकड़ बनाने के लिए कई जिलों का गठन दलित महापुरुषों के नाम पर किया। उन्होंने कुछ जिलों के नाम भी बदले। कासगंज को कांशीराम नगर, हाथरस को महामाया नगर, कानपुर देहात को रमाबाई नगर, शामली को प्रबुद्ध नगर, अमेठी को छत्रपति शाहूजी महाराज नगर, हापुड़ को पंचशील नगर, अमरोहा को ज्योतिबाफुले नगर और संभल को भीमनगर नाम मायावती ने ही दिया था। डॉ. आंबेडकर के नाम पर फैजाबाद के कुछ हिस्से को अलग कर अंबेडकरनगर नाम से नया जिला भी बनाया। इसी कड़ी में मायावती ने केजीएमयू का नाम बदलकर छत्रपतिशाहू जी महराज चिकित्सा विश्वविद्यालय कर दिया था।
जिलों व संस्थाओं के नामकरण किस तरह सियासी नजरिए से देखे जाते हैं, इसकी बानगी अखिलेश यादव के 2012 में सत्ता में आते ही दिख गई। अखिलेश ने मार्च में सत्ता संभाली और जुलाई में अंबेडकरनगर को छोड़कर मायावती द्वारा दलित महापुरुषों के नाम पर रखे गए आठ जिलों के नाम बदल कर पुराने कर दिए। वे जिले फिर से हापुड़, शामली, संभल, अमरोहा, अमेठी, हाथरस, कासगंज, कानपुर देहात के नाम से जाने जाते हैं। मायावती ने अखिलेश के इस फैसले पर राज्यसभा में राज्य सरकार को दलित विरोधी बताते हुए कड़ा विरोध जताया था।
योगी ने अपनी पार्टी के धार्मिक व सांस्कृतिक एजेंडे को ध्यान में रखकर जिलों का नाम बदलना शुरू किया है। पहले फैजाबाद नगर पालिका परिषद को अयोध्या नगर निगम, फिर इलाहाबाद को प्रयागराज किया। फैजाबाद जिले का नाम बदलकर अयोध्या करना उनके इसी एजेंडे का हिस्सा लगता है। जानकार बताते हैं कि योगी सरकार अयोध्या पर आकर रुकने वाली नहीं है। बहुसंख्यक वर्ग से लखनऊ, मिर्जापुर, अलीगढ़, आजमगढ़ सहित कई जिलों के नाम बदलने की मांग हो रही है। भविष्य में और जिलों के नाम बदले जाएं तो अचरज नहीं होना चाहिए।