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शाह बने अध्यक्ष, यूपी में लागू होगा 'मोदी एजेंडा'

Wed, 09 Jul 2014 09:33 PM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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अमित शाह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साथ ही उत्तर प्रदेश में भी मोदी एजेंडा लागू होने का रास्ता साफ हो गया है, जिसके तहत प्रदेश में बड़े सांगठनिक बदलाव किए जा सकते हैं।
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साथ ही यह भी एक सच है कि उत्तर प्रदेश में 2017 में विधानसभा की बाजी जीतने के लिए उन्हें भरोसेमंद साथियों की जरूरत होगी और यह काम यूपी भाजपा की सूरत बदले बिना संभव नहीं है।

उम्मीद की जा रही है कि संगठन में कुछ नए चेहरों को तवज्जो मिल सकती है। साथ ही दिल्ली में यूपी की भागीदारी भी बढ़ सकती है।

हो गई बदलाव की शुरूआत

वैसे तो भगवा रणनीतिकारों ने उत्तर प्रदेश के संगठन महामंत्री राकेश जैन की जगह सुनील बंसल को महामंत्री संगठन बनाकर बदलाव की शुरुआत पहले ही कर दी थी, पर अमित शाह की जिस तरह की कार्यशैली है, उसके चलते और बदलाव हुए बिना नहीं रहेंगे।

शाह उत्तर प्रदेश में ऐसी टीम चाहेंगे जो उनके मनमुताबिक चले और नतीजे दे सके। साथ ही यूपी प्रभारी के रूप में उनके सामने जो फीडबैक आ चुका है, उसके आधार पर भी वे यूपी में अपने भरोसेमंद साथी चाहेंगे।

वे कभी नहीं चाहेंगे कि प्रभारी के रूप में उनके बार-बार कहने के बावजूद यूपी के जिन नेताओं की निष्क्रियता और हीला-हवाली के चलते सभी बूथों की कमेटियां गठित नहीं हो पाईं, उनके पास कोई पद रहे।

इसलिए प्रदेश को मिलेगी प्रमुखता

शाह को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की कमान मिल जाने के बाद प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी को भी नई भूमिका मिलने की चर्चा शुरू हो गई है।

तर्क दिया जा रहा है कि यूपी में भाजपा की चामत्कारिक जीत में शाह के साथ-साथ वाजपेयी व सुनील बंसल की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

बंसल और शाह को इसका पुरस्कार दिया जा चुका है, वाजपेयी को भी पुरस्कार मिलना स्वाभाविक है। वाजपेयी को यूपी में नई भूमिका दी जाएगी या शाह उन्हें अपने भरोसेमंद साथी के रूप में दिल्ली में अपने साथ रखना चाहेंगे, यह भविष्य के गर्त में है।

हालांकि उन्हें नई भूमिका मिलने की बात सभी मान रहे हैं। चूंकि अब भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष उत्तर प्रदेश से नहीं है, इस नाते भी यहां के लोगों को राष्ट्रीय टीम में ज्यादा भागीदारी मिल सकती है।
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बदला सत्ता का केंद्र

अभी तक राजनाथ सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते उत्तर प्रदेश के कई फैसलों में उनका विशेषाधिकार निर्णायक भूमिका निभाता था। इस कारण कई लोग संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका हासिल करने में कामयाब हो जाते थे।

वहीं, उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष न होने की स्थिति में भी यूपी के बड़े नेता इसलिए अपने फैसले लागू करा लेते थे क्योंकि दूसरे प्रांतों से आने वाले राष्ट्रीय अध्यक्षों के पास यहां के बारे में फीडबैक जुटाने को कोई दूसरा उपाय नहीं रहता था। अब ऐसा नहीं हो पाएगा।

प्रभारी के रूप में शाह का नेटवर्क भी है और उनके भरोसे के लोग भी। इसलिए अमित शाह को यूपी के बारे में फैसला लेने के लिए किसी की जरूरत नहीं होगी।

चूंकि मोदी व शाह दोनों संघ के एजेंडे का हिस्सा हैं, इसलिए साफ है कि भाजपा के प्रदेश से जुड़े फैसलों में उत्तर प्रदेश संघ से जुड़े प्रमुख लोगों की राय की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी।
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