कन्नू की तरह ही एमडीआर और एक्सडीआर टीबी से ग्रसित अन्य मरीजों के लिए भी इंजेक्शन लगवाना बड़ी समस्या है। इस समस्या को देखते हुए डब्ल्यूएचओ ने इलाज का पैटर्न ही बदल दिया है। अब मरीजों का इलाज बिना इंजेक्शन के किया जाएगा। उम्मीद है कि जनवरी से यह व्यवस्था लागू कर दी जाएगी।
इस संबंध में डब्ल्यूएचओ की ओर से एनआईटीआरडी में आयोजित बैठक में सभी नोडल सेंटर प्रभारियों को निर्देश दिए गए हैं। यूपी में करीब 4,79,446 टीबी मरीज पंजीकृत हैं। इसमें 15 हजार मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) और 1600 एक्सडीआर के मरीज हैं।
राजधानी में 12500 मरीज हैं, जिसमें एमडीआर के 550 और स्ट्रीम ड्रग रेजिस्टेंस के 60 मरीज हैं। प्रदेश में अभी 2021 डीएमसीएस व 141 सीबीएनएएटी लैब हैं। अभी तक एमडीआर और एक्सडीआर टीबी के मरीजों के उपचार में 7-8 दवाओं के बीच ग्रुप बनाया जाता था।
पिछले सप्ताह नई दिल्ली नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्यूबरकुलोसिस एंड रेस्पेरेटरी डिजीज में यूपी के 15 नोडल प्रभारियों सहित विभिन्न प्रदेशों के नोडल प्रभारियों की बैठक बुलाई गई। इस बैठक में हिस्सा लेने वाले केजीएमयू के एसोसिएट प्रोफेसर और नोडल प्रभारी डॉ. दर्शन बजाज ने बताया कि इसमें टीबी मरीजों के इलाज में आने वाली दुश्वारियों पर चर्चा हुई।
डॉ. बजाज ने बताया कि डब्ल्यूएचओ ने करीब 13 हजार मरीजों पर सर्वे कराया। इसमें कान से कम सुनाई पड़ना और बाद में उसकी रिकवरी न होने, किडनी की समस्या होने की शिकायतें मिलीं। सबसे ज्यादा दिक्कत ग्रामीण इलाके के मरीजों को इंजेक्शन लगवाने में होती है
यहां से लें मदद
राष्ट्रीय टीबी हेल्प लाइन नंबर-1800116666
बदला इलाज का पैटर्न
डॉ. दर्शन बजाज ने बताया कि अभी तक एमडीआर में छह से नौ माह तक और एक्सडीआर में छह से 12 माह तक प्रतिदिन इंजेक्शन देना पड़ता है। अब इसे बंद किया जा रहा है। इलाज के लिए दवाओं के तीन ग्रुप बनाए गए हैं। इन ग्रुप से चार जरूरी दवाएं दी जाएंगी। एमडीआर में पांच दवाएं दी जाएंगी। पहले दवाएं 24 से 30 माह चलती थीं, लेकिन अब इन्हें 18 से 20 माह तक ही दिया जाएगा।