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यूपी में ‘आप’ के लिए खड़ी हैं कई चुनौतियां

Wed, 11 Dec 2013 12:29 PM IST
शोभित श्रीवास्तव/लखनऊ
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दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) के शानदार प्रदर्शन के बाद यूपी समेत देश के लगभग सभी राज्यों में ऐसे राजनीतिक दल की जरूरत महसूस की जा रही है जो सभी तरह की गंदगी पर झाड़ू मारकर एक स्वस्थ नेतृत्व दे सके।
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आम आदमी की समस्याओं पर संवेदनशीलता के साथ गौर कर सके और बदलाव के उनके सपने पूरा करने का भरोसा दिला सके।

सोशल मीडिया पर तो यह सपना देखा भी जाने लगा है। पर सवाल उठता है कि सोशल मीडिया पर पनप रहे इस सपने के लिए क्या यूपी में कोई जमीन है?

सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता के लिए संघर्ष करने वाले दिग्गज भी मानते हैं कि ‘आप’ और उस जैसे संगठन या दल के लिए यूपी का रण आसान नहीं।

कारण, प्रदेश का जातिगत राजनीति के मकड़जाल में फंसा होना। दिल्ली के बाद आम आदमी पार्टी अगर यूपी की ओर रुख करती है तो उसे काफी मेहनत करनी होगी।

दिल्ली में नहीं यूपी जैसी जातिगत राजनीति
प्रदेश के पूर्व डीजीपी व एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के को-ऑर्डिनेटर आईसी द्विवेदी यूपी में आप की संभावना पर कहते हैं, दिल्ली में कभी भी जातिगत राजनीति इतनी हावी नहीं रही जितनी यूपी में है।

यहां ज्यादातर जातियों के अपने-अपने छत्रप हैं। ऐसे में आम आदमी पार्टी के लिए यूपी की राह दिल्ली जितनी आसान नहीं होगी।

उत्तर प्रदेश का बड़ा इलाका आज भी ग्रामीण है। यहां की राजनीति एकदम अलग है। लेकिन यह बात भी सही है कि अभी जो राजनैतिक दल हैं उनके क्रिया-कलापों से प्रदेश की जनता बुरी तरह ऊबी हुई है।
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लोग बदलाव चाहते हैं और किसी भरोसेमंद विकल्प की तलाश में हैं। शहरी क्षेत्रों में इसका फायदा ‘आप’ को मिल सकता है।

हर जिले में करनी होगी कड़ी मेहनत
राज्यसभा के पूर्व सेक्रेटरी जनरल आरसी त्रिपाठी भी आईसी द्विवेदी से इत्तफाक रखते हैं। वे कहते हैं, अगर ‘आप’ को यूपी में आना है तो पहले से ही काफी तैयारी करनी होगी।

हर जिले में कड़ी मेहनत करने के बाद ही यहां कुछ भला हो सकता है। दिल्ली से उत्तर प्रदेश की स्थिति एकदम भिन्न है। ग्रामीण अंचल में आम आदमी पार्टी को सबसे ज्यादा ध्यान देना होगा।

उत्तर प्रदेश में दिल्ली जितनी साक्षरता व शिक्षा भी नहीं है। लेकिन आम आदमी पार्टी को प्रयास करने ही चाहिए। बगैर प्रयास किए कुछ भी हासिल नहीं होगा।

चेहरे ढूंढने की चुनौती
पूर्व आईएएस अधिकारी व लोक प्रहरी संस्था के सचिव एसएन शुक्ला आप की सफलता को एक और नजरिये से देखते हैं।

उनका कहना है, दिल्ली में अन्ना हजारे के आंदोलन से बहुत बड़ा आधार इसके नेताओं का बन गया था। आम आदमी पार्टी में अन्ना आंदोलन से जुड़े नेताओं की बहुतायत है।

इसी का फायदा उन्हें दिल्ली चुनाव में मिल गया। लेकिन यूपी में इस तरह का परफॉर्मेंस आसान नहीं। दिल्ली में पढ़े-लिखे लोगों का प्रतिशत भी यूपी के मुकाबले ज्यादा है।

इसलिए वहां सोशल मीडिया का भी असर चुनाव में दिखा। जबकि यूपी में जाति-धर्म के आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण होता है।

आप को यूपी में झंडा बुलंद करने के लिए न केवल कड़ी मेहनत करनी होगी, साफ-सुथरे चेहरे भी तलाशने होंगे। ऐसे चेहरे जो जमे जमाए दिग्गजों से मुकाबला कर सकें।

अभी तो वादों पर ही टिकी है ‘आप’
लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र के विभागाध्यक्ष रहे डॉ. एसके द्विवेदी भविष्य के सवाल पर कहते हैं कि आम आदमी पार्टी अभी पूरी तरह वादों पर ही टिकी हुई है।

व्यवहार में ‘आप’ को कुछ भी कर दिखाने का अभी मौका नहीं मिला है। यह भी कह सकते हैं कि आप ने अपनी नीतियां भी खुलकर सामने नहीं रखी हैं।

जहां तक वादों का सवाल है तो वह भी कुछ खास नहीं है। उन्होंने भ्रष्टाचार मिटाएंगे व लाल बत्ती नहीं लगाने जैसी बातें कही हैं।

इन सब वादों को जब वे व्यवहार में लाएंगे और कुछ अच्छा काम करके दिखाएंगे तभी लोग आम आदमी पार्टी की ओर आकर्षित होंगे। अभी यह भी देखना होगा कि जो लोग ‘आप’ से जुड़े हैं वे व्यवहार में कितने नैतिक हैं?
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