उत्तर प्रदेश को राजनीतिक अर्थशास्त्र का हृदयस्थल कहा जाता है। मतलब उत्तर प्रदेश की करवट केंद्र में हवा का रुख बदल देती है। देश की कुल सकल आय में 16 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र का है। यूपी की आय में कृषि की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत है।
समझा जा सकता है कि प्रदेश की कृषि आय अगर घट जाए तो केंद्र की कुल आमदनी में किस कदर गिरावट आ जाएगी। उत्तर प्रदेश को अनाज का कटोरा कहा जाता है। यहां के 59 प्रतिशत लोगों का जीवन पूरी तरह खेती पर निर्भर है। वर्ष 2000-2001 से 2014-15 तक प्रदेश में कृषि की औसत वार्षिक वृद्धि दर 2.5 प्रतिशत दर्ज की गई।
अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इसे बढ़ाकर 5 प्रतिशत तक पहुंचाया जा सकता है। इस संभावना को साकार करने और राजनीतिक रूप से भी आगे के मोर्चों से निपटने के लिए योगी सरकार को बजट में इरादे जरूर दिखाने होंगे, जिससे मोदी के फैसलों और इरादों का यूपी में लोगों को लाभ मिलने की उम्मीद दिखे।
- खेती के क्षेत्र में सभी मोर्चों पर तरक्की के लिए पहली जरूरत सिंचाई की बेहतर सुविधाएं मुहैया कराना है। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशन की मार्च 2017 की रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश का कुल सिंचित क्षेत्रफल का अनुपात 77.9 है। इसमें से कुल 20.17 मिलियन हेक्टेयर भूमि ही सिंचित है।
- केंद्र सरकार ने बजट में हर खेत को पानी का संकल्प व्यक्त किया है। योगी सरकार को इस सिलसिले में आगे बढ़ने का इरादा दिखाना होगा। कारण, प्रदेश में सिंचाई की व्यवस्था को दुरुस्त किए बगैर न तो कृषि उपज बढ़नी है और न ऑपरेशन ग्रीन सफल रहने वाला।
- पिछले दिनों आलू को लेकर प्रदेश में राजनीतिक हलचल तेज रही। किसानों की तरफ से बार-बार यह सवाल भी उठता रहा है कि तमाम व्यवस्थाओं के बावजूद नौकरशाही और सरकारी मशीनरी किसानों तक सरकार की योजनाओं का पूरा लाभ नहीं पहुंचने देती। आलू में तो किसानों को लागत मूल्य की आधी कीमत भी नहीं मिल पाती। भंडारण को लेकर भी काफी परेशानी उठानी पड़ती है। इसी वर्ष काफी किसानों ने कोल्ड स्टोर से अपना आलू इसलिए नहीं उठाया क्योंकि किराया आलू की कीमत से अधिक हो रहा था।
- गन्ना किसानों की भी शिकायत है कि उन्हें भी लागत मूल्य के हिसाब से पैसा नहीं मिल पाता। कुछ दिन ठीक रहकर भुगतान की स्थिति फिर बिगड़ गई। सब्जियों की खेती और बागवानी करने वालों की परेशानी है कि वे अगर अपनी उपज को सुरक्षित रखकर उसे बाजार में अच्छा भाव मिलने पर बेचना चाहें तो भंडारण के पर्याप्त प्रबंध नहीं हैं।
- केंद्र सरकार ने किसानी और बागवानी पर फोकस करने के साथ मंडियों की व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने की मंशा बजट में दिखाई है। इसकी झलक 42 मेगा फूड पार्क और हाटों को कृषि बाजार बनाने के संकल्प से दिखती है। योगी को बजट में इन संकल्पों पर भी सरोकार के रंग भरने होंगे।
अर्थशास्त्री प्रो. एपी तिवारी कहते हैं कि केंद्र सरकार की तरफ से बजट में खेती-किसानी, बागवानी और सिंचाई के लिए भारी धन की व्यवस्था कर देने से ही काम नहीं हो जाएगा।
प्रदेश सरकार को केंद्र के बजट के अनुसार अपने बजट में भी उन पर प्रावधान करके आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति दिखानी होगी। साथ ही अन्य कई परीक्षाओं पर भी उत्तीर्ण होकर दिखाना होगा क्योंकि उत्तर प्रदेश का खास महत्व है।
अगर यहां वादों को इरादों में बदलने की संकल्प शक्ति में कमी दिखी तो नतीजा केंद्र और राज्य सरकार को लेकर जनता की नाराजगी के रूप में सामने आ सकता है।
बकौल प्रो. तिवारी प्रदेश में जिस तरह भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, खेती की मौजूदा पद्धति से काम नहीं बनने वाला। इसका विकल्प एकमात्र प्राकृतिक और शून्य लागत खेती यानी गौवंश व गोबर आधारित कृषि ही है। इस पद्धति से पानी की खपत में 90 प्रतिशत कमी लाई जा सकती है। आंध्र प्रदेश इसका उदाहरण है जहां के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने पूरे प्रदेश में प्राकृतिक पद्धति से खेती कराने का फैसला किया है।
मोदी के संकल्प के अनुसार 2022 तक किसानों की आय अगर दोगुनी करनी है तो उसका एक ही तरीका है कि प्राकृतिक खेती से उसकी लागत को घटाकर आधा कर दिया जाए।
प्रदेश सरकार को इस सिलसिले में अपने बजट में संदेश देने की चुनौती स्वीकार करनी पड़ेगी। उम्मीद है कि सरकार ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी पद्धतियों से सिंचाई की व्यवस्था तो हर खेत तक पहुंचाने का प्रबंध बजट में करेगी ही जिससे पानी की खपत घटे।