मुजफ्फरनगर हिंसा की आग भले ही समय बीतने के साथ धीमी पड़ती जा रही हो, लेकिन इसकी आंच जल्द ठंडी होने के आसार नहीं दिख रहे हैं।
यह बात पूरी तरह साफ हो चुकी है कि लोकसभा का अगला चुनाव देश में भले ही चाहे जिन समीकरणों और मुद्दों पर लड़ा जाए।
पर, उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर एक बड़ा मुद्दा बनने वाला है। भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रही-सही कसर भी पूरी कर दी है।
स्वाभाविक रूप से चुनावी समर में सियासी सेनाओं के बीच तीर अब मोदी व मुजफ्फरनगर के मुद्दे पर ही चलेंगे। इसमें समाजवादी खेमा जीतेगा या भगवा दल? मुस्लिम मतदाता सपा के साथ जाएगा या कांग्रेस के? बसपा को कितना लाभ होगा? रालोद जैसे अन्य दल कहां पर खड़े दिखाई देंगे?
इन सारे सवालों का जवाब तो भविष्य देगा। पर, इतना तय है कि चुनावी समर में सूबे की सपा सरकार को मोदी व मुजफ्फरनगर के नाम से काफी चुनौती मिलने वाली है।
घोषित रूप से भले ही सभी राजनीतिक दल सांप्रदायिकता की राजनीति को देश के लिए घातक बताते हों। पर, पिछले दो दशक के दौरान कम से कम उत्तर प्रदेश में एक भी चुनाव ऐसा नहीं दिखाई दिया, जिसमें अल्पसंख्यकों को मुद्दा न बनाया गया हो।
सपा, कांग्रेस व रालोद खुलकर तो बसपा जैसे दल घुमा फिराकर खुद को मुस्लिम हितों का संरक्षक साबित करने की कोशिश में दिखते हैं। दूसरी तरफ भाजपा की कोशिश भी यही रहती है कि वह अन्य दलों की मुस्लिम हितैषी छवि को गाढ़ा करके हिंदुओं के बीच खुद को संरक्षक के रूप में स्थापित करे।
ताकि उनके ज्यादा से ज्यादा से वोट हासिल कर सकें। यह दीगर बात है कि आम मतदाता अब इन सियासी रंगों में उतना फंसता नहीं दिखता, जितना सियासी दल समझते हैं।
माहौल व मौका ही कुछ ऐसा है
इस बार माहौल व मौका ऐसा है कि सियासी दल सांप्रदायिक आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण की ज्यादा कोशिश करेंगे। संकेत दिखाई देने भी लगे हैं।
भाजपा की कोशिश होगी कि मोदी के नाम, काम और चेहरे पर वोट मांगने के लिए मुजफ्फरनगर मुद्दे को धार दी जाए। सपा सरकार को घेरने की कोशिश की जाए। वहीं सपा भी इस मुद्दे पर अपनी भूमिका को सही बताने और मुस्लिम हितैषी छवि को धार देने की कोशिश करेगी।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के मुजफ्फनगर दौरे के साथ शुरुआत भी हो गई है। कहा तो यह भी जा रहा है कि प्रधानमंत्री के मुजफ्फरनगर दौरे की जानकारी मिलने के बाद मुख्यमंत्री का दौरा आनन-फानन में तय हुआ ताकि कांग्रेस उससे बाजी न मार ले जाए।
सोमवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी या उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी मुजफ्फरनगर पहुंच सकते हैं। इसके पीछे भी मंशा मुस्लिम हितैषी छवि को तराशने की ही दिख रही है। इसकी शुरुआत केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से मुजफ्फरनगर के मुद्दे पर सपा सरकार को कठघरे में खड़ा करने के साथ हो चुकी है।
गृह मंत्रालय ने दावा किया था कि उसके कहने के बाद कर्फ्यू लगाया गया। गांवों में फोर्स सक्रिय की गई। कांग्रेस की कोशिश मुजफ्फरनगर के बहाने मुसलमानों को यह संदेश देने की होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर मोदी का मुकाबला कांग्रेस ही कर सकती है।
किसे मिलेगा फायदा
सपा और कांग्रेस के बीच मुजफ्फरनगर के मुद्दे और मोदी की मौजूदगी का लाभ उठाने की होड़ भी सामने आने के आसार है। दोनों अल्पसंख्यकों को गोधरा और गुजरात के बहाने अपने-अपने खेमे में खींचने की कोशिश करेंगे।
कांग्रेस, सपा को पटकनी देने के लिए यह तर्क भी उछाल सकती है कि मोदी को रोकने में मुस्लिमों को तभी कामयाबी मिलेगी, जब उनका वोट कांग्रेस को मिले।
सपा की तरफ से यह आरोप लगना शुरू ही हो गए हैं कि भाजपा और कांग्रेस आपस में साठगांठ करके इस तरह का माहौल बना रहे हैं कि दोनों को लाभ हो।
बसपा और राष्ट्रीय लोकदल की भी कोशिश होगी कि मोदी के बहाने मुजफ्फरनगर की घटना का जिक्र करके मुसलमानों के बीच अपने लिए वोट तलाशने की कोशिश करें।
संयोग बन रहे हैं भाजपा के लिए मौका
भाजपा भी मोदी व मुजफ्फरनगर के बहाने अपने भगवा रंग को वोटरों पर चढ़ाने की कोशिश कर रही है। इसके सुबूत दूसरों ने नहीं सरकारी मशीनरी और परिस्थितियों ने ही भाजपा को उपलब्ध करा दिए हैं।
छेड़छाड़ की घटना से लेकर तीन युवकों की हत्या और उस पर कार्रवाई, फिर पंचायत और पंचायत से लौटती भीड़ पर हुई फायरिंग के मामले में सरकार व प्रशासनिक मशीनरी के रुख पर सवाल उठ रहे हैं।
मुख्यमंत्री अखिलेश रविवार को घटनास्थल पर पहुंचे, तो अफसरों पर कार्रवाई ने भी भाजपा को सरकार पर हमला बोलने का एक मौका फिर दे दिया। सिर्फ भाजपा ने ही नहीं, कांग्रेस ने भी कार्रवाई में सरकार पर पक्षपात का आरोप लगाया है।