भारत में अब ब्रेनड्रेन का नहीं, ब्रेनगेन का माहौल है। यहां हर क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर का काम हो रहा है। विदेशों में काम कर रहे प्रवासी भारतीय वैज्ञानिक और विशेषज्ञ यहां के वैज्ञानिक संस्थानों की लैबोरेटरी में जाकर इसका अनुभव कर सकते हैं।
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने विज्ञान महोत्सव में ग्लोबल इंडियन साइंस एंड टेक्नोलॉजी स्टेकहोल्डर्स (जीआईएसटी) मीट में यह बात कही। उन्होंने कहा, विदेश यात्रा के समय मुलाकात के दौरान अपने क्षेत्र में सफलता पा चुके लोग मुझसे अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं।
उन्हें अपनी वतन की यादें वापस खींचती हैं। ऐसे प्रवासी भारतीय वैज्ञानिकों से मेरा कहना है कि वे वापस आएं। 2022 तक नए भारत और 2030 तक वैज्ञानिक विकास के क्षेत्र में देश को टॉप-3 में जगह दिलाने में सहयोग करें।
हमेशा के लिए नहीं आ सकते तो कुछ महीने के लिए आकर काम करें। ऐसे प्रवासी भारतीय वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों के लिए बेहतर सुविधाएं देने का काम केंद्र सरकार कर रही है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि नैनो टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, डिफेंस, स्पेस रिसर्च, ह्यूमन जेनोमिक्स, मौसम विज्ञान जैसे तकनीकी विषयों में भारत में बड़ा काम हो रहा है। प्रवासी भारतीय वैज्ञानिक जिस क्षेत्र में काम करना चाहें, भारत में काम करने का मौका उन्हें मिलेगा।
उन्होंने दावा किया कि मौसम का सटीक अनुमान लगाने और नैनो टेक्नोलॉजी पर काम करने वाले तीन सबसे प्रमुख देशों में भारत अब शामिल है। यही वजह है कि हम सुनामी जैसी विभीषिकाओं से भी जान-माल के नुकसान को न्यूनतम करने में सफल रहे हैं।
कोख में चक्रव्यूह भेदना सीखा अभिमन्यु : खन्ना
यूपी सरकार के नगर विकास मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा कि महाभारत में अभिमन्यु के कोख में चक्रव्यूह तोड़ना सीखने का जिक्र है। अब वैज्ञानिक भी मान रहे हैं कि कोख से ही बच्चा सीखना शुरू कर देता है।
इससे साबित हो रहा है कि हम वैज्ञानिक रूप से पहले से ही समृद्ध रहे हैं। उन्होंने वैज्ञानिकों से कूड़े के निस्तारण के लिए रास्ता सुझाने की अपील की जो शहरों के लिए बड़ी समस्या बन चुका है।
वोट नहीं, कोड से तय हो रहे चुनाव : सारस्वत
मूल रूप से लखनऊ निवासी और अमेरिका में बसे वैज्ञानिक डॉ. विजय सारस्वत का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ने लोकतंत्र की परिभाषा ही बदल दी है। हम जो भी गतिविधियां अलग-अलग वेबसाइट या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर करते हैं, डाटा सेंटर्स व सर्वर की मदद से आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस हमारी विचारधारा को प्रभावित करने का काम करता है।
अमेरिक के राष्ट्रपति चुनाव में इस काम को बखूबी किया गया। हालांकि भारत में 2019 के चुनाव में इसकी संभावना पर कुछ भी बोलने से उन्होंने मना कर दिया। आईआईटी कानपुर से ग्रेजुएट विजय सारस्वत ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मदद से कोड तैयार किए जाते हैं।
इसके काम करने की सटीकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह यूजर्स को चिह्नित करके उनके लिए विशेष तौर पर तैयार मेसेज और सूचनाएं उपलब्ध करा सकता है।
आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के विशेषज्ञ डॉ. सारस्वत ने कहा कि युवाओं को नए मौके भी इसने उपलब्ध कराए हैं। 10-12 युवा मिलकर इंस्टाग्राम नाम से एक मीडिया प्लेटफॉर्म बनाते हैं और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मदद से दो साल के अंदर यह करोड़ों डॉलर कमाने वाली कंपनी बन जाती है।
कोई भी पहुंच सकता है शीर्ष पर : भार्गव
मेरठ निवासी और अब ऑस्ट्रेलिया में रह रहे प्रो. सुरेश भार्गव दुनियाभर के अलग-अलग देशों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। नेचर जैसे अंतरराष्ट्रीय जर्नल के एडिटोरियल बोर्ड में शामिल और आरएमआईटी यूनिवर्सिटी के संस्थापक प्रो. भार्गव ने कहा, मेरा प्रयास है कि ऑस्ट्रेलिया और भारत के काउंसिल फॉर साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) को साथ लाया जाए।
अभी एक कार्यक्रम मैंने शुरू किया है। इसमें भारत की सीएसआईआर की आठ लैब से शोधार्थियों को चुना है। ये शोधार्थी अलग-अलग विषयों पर ऑस्ट्रेलिया के विशेषज्ञों के साथ काम करेंगे। प्रो. भार्गव ने कहा, मध्यम वर्ग से आने की वजह से आपके शीर्ष पर पहुंचने के रास्ते बंद नहीं होते। मौके सबके लिए मौजूद हैं। शीर्ष पर कोई भी पहुंच सकता है।
अटलजी का हिंदी में ऑस्ट्रेलिया में इंटरव्यू किया
प्रो. सुरेश भार्गव ने कहा कि उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का हिंदी में इंटरव्यू किया था, जो वहां रेडियो पर प्रसारित हुआ। इसे ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीयों ने काफी पसंद किया।
50 प्रतिशत शोध प्रकाशित ही नहीं हो पाते : अमिताभ प्रकाश
मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज और एम्स नई दिल्ली से पढ़े डॉ. अमिताभ प्रकाश दुनिया के कई बड़े वैज्ञानिक जर्नल के लिए काम करते हैं। उनका कहना है कि 50 प्रतिशत वैज्ञानिक शोध प्रकाशित ही नहीं किए जाते हैं।
ऐसे शोध जिन पर करोड़ों रुपये पूरी दुनिया में खर्च हो रहे हैं, उस शोध का परिणाम नकारात्मक, सकारात्मक जैसा भी रहे, उसे प्रकाशित किया जाना चाहिए। इससे समाज और वैज्ञानिक समुदाय दोनों का भला होगा। शोध और रिसर्च पेपर पब्लिश करते समय वैज्ञानिक भी ईमानदारी दिखाएं। इस दिशा में इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी ने काफी प्रयास किए हैं। भारत सरकार ने भी फर्जी जर्नल पर सख्ती की है।
लखनऊ में पढ़े गुलाटी अब पूरी दुनिया को दे रहे दवा
लखनऊ के स्टेशन रोड निवासी प्रो. अनिल गुलाटी ने कहा, केजीएमयू से पढ़ाई के बाद सीडीआरआई के लिए पांच साल काम किया। इसके बाद अलग-अलग देशों में काम करने का मौका मिला। इन दिनों अमेरिका की फार्मा कंपनी के लिए नई दवाओं पर रिसर्च कराने की जिम्मेदारी मेरी है।
कार्डियक अरेस्ट, सड़क हादसे में अत्यधिक खून बह जाने, एक्यूट किडनी इंजरी, अल्जाइमर, स्पाइनल कॉर्ड इंजरी जैसी बीमारियों के लिए करीब आठ दवाएं अभी पाइप लाइन में हैं। भारत में इनमें से अधिकांश के क्लीनिकल ट्रायल शुरू हो गए हैं, वहीं अमेरिका में भी इनके ट्रायल जल्द ही शुरू हो जाएंगे। फार्मा कंपनी की एक यूनिट नोएडा में भी हमने खोली है।