नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन के ऊंचाहार स्थित ऊर्जा उत्पादन संयंत्र के बॉयलर फटने के बाद हवा में जो राख का ढेर उड़ा वह 500 डिग्री सेंटीग्रेड तक गर्म होने की वजह से इंसानों को भून देने वाला था। आग व अन्य हादसों के दौरान बचाव व राहत कार्य के लिए प्रशिक्षित सीआईएसएफ का अग्निशमन दस्ता भी ऐसे हादसे से निपटने के लिए तैयार नहीं था। सीआईएसएफ के अग्निशमन दस्ते के साथ कुल 164 जवानों ने सबसे पहले बचाव कार्य शुरू किया और वहां मौजूद अन्य लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला।
औद्योगिक संस्थानों की सुरक्षा के लिए गठित सीआईएसएफ के जवानों ने हादसे के बाद सबसे पहले राहत कार्य का जिम्मा संभाला। प्राकृतिक आग व बिजली उपकरणों से लगने वाली आग से निपटने के तरीकों से वाकिफ सीआईएसएफ का अग्निशमन दस्ता भी इस हादसे के बाद असहाय नजर आया।
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खौलते पानी से भी ज्यादा गर्म राख के कण हवा में उड़कर सीआईएसएफ के जवानों के आंख, कान और नाक को जला दे रहे थे। ऐसे में राहत कार्य बेहद कठिन हो गया था। इतनी गर्म राख से बचने का कोई तरीका पहले से सोचा ही नहीं गया था और इससे निपटने लायक कोई उपकरण भी अग्निशमन टीम के पास नहीं थे। ऐसे में केवल राख पर पानी डालना ही एकमात्र उपाय था लेकिन लगभग तीस ट्रक राख को बुझाने के लिए पानी और वक्त दोनों ही कम साबित हो रहे थे।
सीआईएसएफ के सीनियर कमांडेंट ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि हादसे की जानकारी मिलने के तुरंत बाद अग्निशमन टीम के 64 सदस्य पहुंचे । कॉलोनी में मौजूद 100 जवानों को भी राहत कार्य के लिए तुरंत बुलाया गया। लगभग ढाई सौ लोगों को घटनास्थल से बाहर निकालने में सीआईएसएफ टीम कामयाब रही।
आकाओं को खुश करने के चक्कर में चढ़ाई बलि
हादसे के बाद उठाता धुंए का गुबार
- फोटो : amar ujala
एनटीपीसी की ऊंचाहार तापीय परियोजना में रिकॉर्ड समय में 500 मेगावाट क्षमता की नई इकाई की स्थापना का श्रेय लेने की शीर्ष प्रबंधन की कोशिश इतने बड़े हादसे का सबब बनी। सत्ता में बैठे राजनीतिक आकाओं को खुश करने के चक्कर में ढाई दर्जन लोगों की बलि चढ़ा दी गई। यही नहीं, इतने बड़े हादसे की जांच के नाम पर भी लीपापोती की तैयारी है।
एनटीपीसी खुद ही अपनी जांच करेगा। इस जांच को लेकर अभी से सवाल उठने लगे हैं। परियोजना से जुड़े लोग ही दबी जुबान में कह रहे हैं कि ‘बड़ों’ को बचाने की पटकथा लिख दी गई है। नीचे के अधिकारियों और ठेकेदारों को बलि का बकरा बनाकर पूरे मामले को रफा-दफा करने की तैयारी है।
ऊंचाहार परियोजना में कम से कम वक्त में 500 मेगावाट की इकाई स्थापित करके वाहवाही लूटने की एनटीपीसी शीर्ष प्रबंधन की जिद ने तमाम जिंदगियों को निगल लिया। जानकारों की मानें तो 500 मेगावाट क्षमता की जिस छह नंबर इकाई पर हादसा हुआ, वहां उस समय 250-300 मजदूर काम कर रहे थे। छह नंबर इकाई का काम पूरा हो जाने के एनटीपीसी प्रबंधन के दावे को सही माना जाए तो एक बड़ा सवाल यह है कि फिर इतने मजदूर काम पर क्यों लगाए गए थे?
परियोजना से जुड़े सूत्रों के मुताबिक बॉयलर पर इंसुलेशन की रबर लगवाई जा रही थी। चलते हुए बॉयलर पर इंसुलेटर लगवाना भी सुरक्षा में एक बड़ी चूक मानी जा रही है। विशेषज्ञों की मानें तो इंसुलेटर का काम पूरा हुए बिना बॉयलर को चलाया ही नहीं जाना चाहिए क्योंकि इससे दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।
मानक से बहुत ज्यादा हो गया था प्रेशर
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तकनीकी जानकारों के अनुसार फर्नेश का प्रेशर माइनस 5 से प्लस 5 एमएमडब्ल्यूएच (दबाव मापने की इकाई) के बीच होना चाहिए जो 350 एमएमडब्ल्यूएच तक पहुंच गया था। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी दशा में बॉयलर का प्रेशर माइनस में ही होना चाहिए था। सुरक्षा मानकों के लिहाज से इसकी भी अनदेखी की गई।
तीन दिन पहले ही मिलने लगे थे संकेत
जानकारों की मानें तो हादसे से तीन दिन पहले ही इसके संकेत मिलने लगे थे। छह नबंर इकाई में जो कोयला फीड किया जा रहा था, उसका कुछ हिस्सा बॉयलर की दीवारों पर जमने लगा था। तीन दिन से बॉयलर की दीवारों पर क्लींकर (ढेला) बनने लगा था। बॉयलर को चलाने के लिए इन क्लींकरों को तोड़ना पड़ता है। यही नहीं, ऐश डक्ट हॉपर (राख एकत्र करने की जगह) क्षमता से 15 मीटर ज्यादा भर गए थे। इससे बॉयलर में प्रेशर बन रहा था।
बिजली की मांग नहीं, फिर भी चलाई जा रही थी इकाई
जानकारों का कहना है कि बॉयलर में क्लींकर बनने और ऐश डक्ट हॉपर के क्षमता से ज्यादा भरे होने के बावजूद छह नंबर इकाई को 200 मेगावाट क्षमता पर चलाया जा रहा था। बिजली की मांग न होने के बाद भी केवल आकाओं को खुश करने के लिए इकाई को चलाया जा रहा था। मौसम बदलने की वजह से पूरे देश में बिजली का लोड कम है। ऐसे में इकाई को चलाने का कोई औचित्य भी नहीं था।
सूत्रों की मानें तो एनटीपीसी शीर्ष प्रबंधन 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर प्रधानमंत्री के हाथों इस इकाई का लोकार्पण कराकर रिकॉर्ड समय में काम पूरा कराने का श्रेय लूटने की फिराक में था। यही वजह है कि आधी-अधूरी तैयारियों के बीच बीते अप्रैल में इस इकाई को चालू करा दिया गया। यह इकाई इस साल के अंत तक स्थापित की जानी थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि कॉमर्शियल उत्पादन शुरू कराने के लिए अभी इस इकाई में काफी काम बाकी है। कहा तो यह भी जा रहा है कि एनटीपीसी के एक बड़े अफसर ने निदेशक पद पर प्रोन्नति के लिए भी काम पूरा होने का दावा करते हुए समय से पहले इकाई को चालू करवा दिया।
सुरक्षा मानकों से न हो समझौता : शैलेंद्र दुबे
ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के अध्यक्ष शैलेंद्र दुबे का कहना है कि हादसे की मुख्य वजह क्या थी, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन प्रथमदृष्टया सुरक्षा मानकों में चूक तो दिखाई देती ही है। बिजलीघरों में सुरक्षा मानकों से किसी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए।