पढ़ाई का प्रेशर बढ़ने के साथ-साथ मेडिकल के छात्रों का ब्लड प्रेशर भी बढ़ता जा रहा है। अब इसे पढ़ाई का बोझ कहें या प्लेसमेंट की चिंता।
वास्तविकता यही है कि मेडिकल की पढ़ाई के लिए प्रवेश लेने वाले ज्यादातर अभ्यर्थी फाइनल ईयर में पहुंचते-पहुंचते हाई ब्लडप्रेशर के शिकार हो जाते हैं। यह तथ्य सामने आने के बाद कई छात्रों पर इसका अध्ययन किया गया।
इसके बाद विशेषज्ञों का कहना है कि पढ़ाई का तनाव और फिजिकल एक्टिविटी में कमी के चलते छात्र हाई ब्लडप्रेशर का शिकार हो रहे हैं। इरा मेडिकल कॉलेज और किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में कराई गई एक स्टडी में यह तथ्य सामने आए हैं।
दोनों ही मेडिकल कॉलेज के फार्माकलॉजी विभाग ने इसके लिए 40 मेडिकल छात्रों के ऊपर एक स्टडी की। इसमें बराबर संख्या में फर्स्ट ईयर और फाइनल ईयर के छात्रों को शामिल किया गया।
यह अध्ययन अगस्त और सितंबर 2013 के दौरान किया गया। हर दिन सुबह 8-9 बजे के बीच तीन सप्ताह तक मेडिकल छात्रों की ब्लड प्रेशर की रीडिंग ली गईं। इसके बाद इनके ब्लड प्रेशर की औसत रीडिंग निकाली गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, फर्स्ट ईयर के छात्रों के ब्लड प्रेशर की औसत रीडिंग 116/72 एमएम एचजी मिली। वहीं फाइनल ईयर के छात्रों की औसत रीडिंग 122/78 एमएम एचजी पाई गई।
स्टडी करने वाली टीम के सदस्यों का कहना है कि यह स्थिति केवल मेडिकल छात्रों में ही नहीं है। इंजीनियरिंग और एमबीए जैसे प्रोफेशनल कोर्सेज में भी छात्रों का यही हाल है।
यह रही वजह
फिजिकल एक्टिविटी में कमी
खानपान की आदतों में बदलाव
पढ़ाई का अतिरिक्त बोझ
भविष्य को लेकर अनिश्चितता