‘कृषक दुर्घटना बीमा योजना’ किसानों की सबसे ज्यादा मददगार साबित हुई पर सरकारी तंत्र की काहिली ऐसी रही कि बीमा कंपनी से 2010-14 के बीच कॉन्ट्रैक्ट ही नहीं हो सका। किसानों के दुर्घटना के दावों का भुगतान शासन अपने स्तर से ही करने लगा।
इससे सरकारी खजाने को 301 करोड़ रुपये की चपत लगी।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट कहती है कि यदि योजना पहले की तरह बीमा कंपनियों के सहयोग से चल रही होती तो सरकारी खजाने को नुकसान न होता।
‘कृषक दुर्घटना बीमा योजना’ की कहानी ‘संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना’, मौसम आधारित फसल बीमा योजना व ‘आम आदमी बीमा योजना’ से हटकर है। यह ऐसी योजना थी जो बीमा कंपनियों के सहयोग से लक्ष्य के हिसाब से आगे बढ़ रही थी।
सरकार ने 2004-05 से 2009-10 के बीच बीमा कंपनियों को इसके लिए 160.49 करोड़ रुपये प्रीमियम का भुगतान किया। जबकि इस दौरान कंपनियों ने 229.65 करोड़ रुपये किसानों के क्लेम चुकता किए। इससे सरकारी खजाने को 69.16 करोड़ रुपये की बचत हुई।
बीमा हुआ होता तो सिर्फ 655.20 करोड़ रुपये करना पड़ता भुगतान
2010-14 के बीच किसानों के क्लेम के रूप में सरकार को 956.56 करोड़ रुपये का भुगतान करना पड़ा। सीएजी का कहना है कि यदि सरकार ने अनुबंध किया होता तो उसे सिर्फ 655.20 करोड़ रुपये ही प्रीमियम के रूप में कंपनियों को देने पड़ते।
इसके बाद कंपनियां किसानों के क्लेम के रूप में 956.56 करोड़ का भुगतान करतीं। ऐसा नहीं होने से 301.36 करोड़ रुपये की चोट सरकारी खजाने पर पहुंची।
बजट में बीमा का प्रावधान हुआ, पर कॉन्ट्रैक्ट करना भूल गए
सीएजी ने मार्च 2015 की अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सरकार ने 2010-14 के बीच में बीमा प्रीमियम भुगतान के लिए बजट का प्रावधान तो किया गया लेकिन ढिलाई की वजह से बीमा कंपनियों से कॉन्ट्रैक्ट नहीं किया। सरकार ने भी इस चूक को माना।
सपा सरकार ने पांच लाख किया था मुआवजा
प्रदेश में 2004-05 में किसानों को व्यक्तिगत बीमा कवर देने के लिए ‘कृषक दुर्घटना बीमा योजना’ शुरू की गई थी। पहले इसमें मृत्यु व स्थायी अपंगता पर 1 लाख रुपये दिया जाता था, अप्रैल 2012 में मौजूदा सरकार ने यह रकम बढ़ाकर पांच लाख रुपये कर दी।
इनका होता है बीमा
खतौनी में दर्ज खातेदार व सह-खातेदार जिनकी उम्र न्यूनतम 12 वर्ष व अधिकतम 70 वर्ष हो। प्रदेश में किसानों की संख्या 2.5 करोड़ है।
इन मुश्किलों में किसान पाते हैं मदद
आग, बाढ़, बिजली गिरने, करंट लगने, जीव-जंतुओं के काटने, डूबने, मकान गिरने, वाहन दुर्घटना, डकैती, दंगा, मारपीट, आतंकवादी घटना व अप्राकृतिक कारणों अथवा अन्य किसी तरह की दुर्घटना में मौत पर।
अब तो कलेक्टर के रहमो-करम तक सीमित योजना
कृषक दुर्घटना बीमा योजना की राशि बढ़ाकर पांच लाख रुपये किया जाना पीड़ित परिवार के लिए नि:संदेह राहत वाला कदम है। सांप काटने या दुर्घटनाओं में मौत के मामले तो ढेरों आते हैं लेकिन मदद नहीं मिल पाती।
दरअसल जिला प्रशासन तब तक किसी घटना का संज्ञान ही नहीं लेता जब तक कि वह प्रशासनिक दृष्टि से संवेदनशील न हो। इसके लिए पैरवी करानी पड़ती है।
मामले पर राजस्व परिषद के आयुक्त व सचिव आलोक कुमार का कहना है कि कृषक दुर्घटना बीमा योजना में बीमा कंपनी के चयन के लिए टेंडर किए जा चुके हैं। टेक्निकल बिड खुल चुकी है। फाइनेंसियल बिड के लिए शासन से अनुमति मांगी गई तो वहां से फिलहाल प्रक्रिया स्थगित करने का निर्देश मिला है। सरकार का आगे जैसा निर्देश होगा, किया जाएगा।