राज्य सरकार के सार्वजनिक उद्यमों ने अनियमितताओं का रिकार्ड तोड़ दिया। 43 सार्वजनिक उद्यमों ने सालाना पेश की जाने वाली 266 रिपोर्ट जमा ही नहीं कीं। इससे ये नहीं पता चल सका कि इन उद्यमों की आय-खर्च-घाटा का हिसाब किताब क्या है। कई विभाग तो इतने दिग्गज निकले कि 21 साल से लगातार रिपोर्ट दाखिल नहीं की। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ है। सीएजी ने इसपर गंभीर आपत्ति जताते हुए वित्तीय अनियमितता की आशंका जताई है।
किसी भी संस्थान, उपक्रम और कंपनी के लिए सालाना रिपोर्ट दाखिल करना अनिवार्य है। इससे उनकी वित्तीय सेहत की जानकारी मिलती हैै। रिपोर्ट ये पता चलता है कि उनकी आय-व्यय कितना रहा। कितना लोन लिया है। कितना लोन अदा किया हैै। बैंकों की ग्रेडिंग क्या है। संस्थान के पास कितनी संपत्ति है। कितनी संपत्ति बेची लेकिन इतनी महत्वपूर्ण रिपोर्ट भी 43 सरकारी उद्यमों ने जमा करना मुनासिब नहीं समझा।
इस फेहरिस्त में शीर्ष पर राज्य हथकरघा निगम है जिसने वर्ष 2001 के बाद से आजतक कुल 21 सालाना रिपोर्ट सरकार को नहीं दी। दूसरे नंबर पर वक्फ विकास निगम हैै, जिसने 2003 के बाद से आजतक रिपोर्ट नहीं दी। विभाग के ऊपर कुल 18 रिपोर्ट बकाया हैं। अल्पसंख्यक वित्त व विकास निगम 16 रिपोर्ट दाखिल न करने के साथ तीसरे नंबर पर है। लखनऊ सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज और हस्तशिल्प एवं विकास विपणन निगम लिमिटेड ने 13 साल से अपनी रिपोर्ट नहीं दी। उत्तर प्रदेश ड्रग्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड, आगरा-मथुरा सिटी ट्रांसपोर्ट लिमिटेड, कानपुर सिटी ट्रांसपोर्ट लिमिटेड और वाराणसी सिटी ट्रांसपोर्ट लिमिटेड ने 12 साल से अपने खर्च का हिसाब नहीं दिया है।