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प्रतिष्ठा बढ़ाने व बचाने की लड़ाई बना उपचुनाव, विपक्षी सूरमाओं की थाह की होगी परीक्षा

Sat, 19 Oct 2019 05:58 PM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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नेता (प्रतीकात्मक) - फोटो : अमर उजाला
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विधानसभा की 11 सीटों का उपचुनाव निर्णायक घड़ी में पहुंचते-पहुंचते सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच प्रतिष्ठा बढ़ाने व बचाने की लड़ाई में बदल गया है। सत्तापक्ष के सामने भाजपा व साथी अपना दल विधायकों के त्यागपत्र से रिक्त होने वाली नौ सीटों पर जीत बरकरार रखने के साथ सपा दिग्गज आजम खां के गढ़ रामपुर और बसपा के गढ़ अंबेडकरनगर की जलालपुर सीट पर भी विजय पताका फहराकर प्रतिष्ठा बढ़ाने की चुनौती है। 
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उधर, सपा व बसपा के सामने अपने इन गढ़ों पर कब्जा बनाए रखते हुए एक-दो सीटें और जीतकर खुद को साबित करने की चुनौती है कि हम भी कम नहीं हैं। इन चुनावों में अयोध्या पर फैसला आने की आहट और अनुच्छेद 370 की समाप्ति भी कसौटी पर होंगे। उपचुनाव के लिए 21 अक्तूबर को वोट डाले जाने हैं। 

हालांकि चुनाव प्रचार पर नजर डालें तो सत्तापक्ष की तुलना में विपक्षी दलों के बड़े नेताओं की बहुत दिलचस्पी नहीं दिखी। ऐसा लगा, जैसे उन्होंने चुनाव से पहले ही हथियार डाल दिए हों, लेकिन इसके बावजूद रामपुर और जलालपुर सीटों को भाजपा के लिए बहुत आसान नहीं माना जा सकता। 
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सत्तापक्ष की तरफ से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह सभी 11 सीटों पर एक बार चुनाव से पहले और एक बार चुनाव के दौरान जा चुके हैं। इसके अलावा हर सीट पर प्रदेश सरकार के एक मंत्री, एक प्रदेश पदाधिकारी और स्थानीय सांसद व विधायकों को भी लगाया गया है। सभी ने भाषणों में अयोध्या और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति का श्रेय लेने की कोशिश कर वोटों की लामबंदी की कोशिश की है।

दूसरी तरफ विपक्षी उम्मीदवारों के लिए मायावती और प्रियंका गांधी वाड्रा जैसे बसपा तथा कांग्रेसी दिग्गजों ने एक भी सीट पर सभा नहीं की। बसपा और कांग्रेस उम्मीदवार अपनी-अपनी पार्टियों के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्षों मुनकाद अली और अजय कुमार लल्लू के प्रचार के भरोसे ही मैदान में हैं। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी प्रचार के अंतिम दिन शनिवार को सिर्फ रामपुर में एक सभा करने जा रहे हैं।
 

रामपुर की लड़ाई बनी खास

लोगों की सबसे ज्यादा उत्सुकता रामपुर सीट को लेकर है। विधानसभा की रामपुर सीट ऐसी है जहां भाजपा न रामलहर में 1991 में जीत हासिल कर पाई और न 2017 में मोदी लहर में। इसके बावजूद कि भाजपा रामपुर लोकसभा सीट पर झंडा फहरा चुकी है। पिछले कुछ महीनों से मुकदमों में घिरे आजम खां 1996 को छोड़कर इस सीट पर 1989 से लेकर अब तक जीतते चले आ रहे हैं। 

भाजपा ने बसपा से चुनाव लड़ चुके भारतभूषण गुप्त को उतारकर रामपुर में जीत का सपना सच करने की सोची है। सपा से आजम की पत्नी राज्यसभा सदस्य डॉ. तजीन फातिमा के उतरने से यह लड़ाई सीधे आजम की प्रतिष्ठा से जुड़ गई है। बसपा ने अनुसूचित जाति व मुस्लिम वोट के भरोसे जुबेर मसूद खान को मैदान में उतारकर लड़ाई को त्रिकोणात्मक बनाने की कोशिश की है।

जलालपुर सीट पर टिकीं सबकी नजरें
जलालपुर सीट पर भी सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई  है। भाजपा ने इस सीट पर 1989 से अब तक सिर्फ एक बार 1996 में जीत हासिल की है। भाजपा ने यहां विजय पाने के लिए 1996 में पार्टी का परचम फहराने वाले शेरबहादुर सिंह के पुत्र डॉ. राजेश सिंह को मैदान में उतारा है। 

बसपा ने इस सीट पर अपनी पकड़ बनाए रखने को विधानमंडल दल के नेता लालजी वर्मा की पुत्री छाया वर्मा को मैदान में उतारा है। सपा ने सुभाष राय और कांग्रेस ने सुनील मिश्र के सहारे ब्राह्मण समीकरण से जीत हासिल करने का सपना संजोया है।

घोसी सीट इम्तिहान दिलचस्प

भाजपा विधायक फागू चौहान के त्यागपत्र से खाली हुई घोसी सीट पर भाजपा ने विजय राजभर को मैदान में उतारकर राजभर समाज को साधने की कोशिश की है। उनके सामने सपा के पूर्व विधायक सुधाकर सिंह हैं जिन्हें तकनीकी कारणों से साइकिल चुनाव चिह्न नहीं मिल पाया। 

बावजूद इसके भाजपा की उन्हीं से मुख्य लड़ाई दिख रही है। ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा का प्रत्याशी होने से भाजपा के लिए कुछ चुनौती दिखाई दे रही है लेकिन बसपा के कय्यूम अंसारी और कांग्रेस के राजमंगल यादव के मैदान में उतरने से सपा के वोटों का भी समीकरण गड़बड़ाता दिख रहा है।

इगलास सीट पर रालोद की गैरहाजिरी का लाभ किसे
इगलास (सुरक्षित) सीट पर सर्वाधिक तादाद जाट मतदाताओं की है। इस सीट पर रालोद प्रत्याशी सुमन दिवाकर का पर्चा खारिज हो चुका है। रालोद नेताओं ने भाजपा को हराने वाले उम्मीदवार को वोट देने की अपील की है। बसपा के साथ इस बार जिले के दिग्गज ब्राह्मण नेता रामवीर उपाध्याय व उनके भाई मुकुल उपाध्याय नहीं हैं। पर, मुकाबला उलझा हुआ है।

गंगोह सीट पर भाजपा को मिल रही चुनौती
भाजपा के प्रदीप चौधरी के सांसद चुने जाने से खाली गंगोह सीट पर भाजपा को कांग्रेस, बसपा व सपा से से चुनौती मिल रही है। भाजपा ने कीरत सिंह को, सपा ने पूर्व सांसद व पूर्व मंत्री यशपाल सिंह के बेटे इंद्रसेन को चुनाव में उतारा है। दोनों ही गुर्जर समाज से हैं। 

कांग्रेस ने अपने दिग्गज नेता इमरान मसूद के भाई नोमान मसूद को और बसपा ने नगर पालिका के पूर्व चेयरमैन चौधरी इरशाद को टिकट दिया है। भाजपा मुस्लिम मतों में बंटवारे और अपने परंपरागत वोटों के सहारे जीत का भरोसा कर रही है।
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कैंट सीट पर भाजपा के सामने बिखरा विपक्ष 

राजधानी में कैंट सीट का चुनाव अंतिम चरण में भाजपा बनाम सारे विपक्षी दलों में सिमटता दिख रहा है। भाजपा ने सुरेश तिवारी, सपा ने मेजर आशीष चतुर्वेदी और बसपा ने अरुण द्विवेदी को मैदान में लाकर ब्राह्मण कार्ड और कांग्रेस ने दिलप्रीत सिंह को उतारकर पंजाबी और सिख समीकरण के सहारे चुनावी नैया पार लगाने का सपना संजोया है।

जैदपुर सीट पर वोटों के ध्रुवीकरण का लाभ
बाराबंकी में जैदपुर सीट पर भाजपा ने नए युवा चेहरे अंबरीष रावत पर भरोसा जताया है। वहीं कांग्रेस ने पूर्व सांसद पीएल पुनिया के पुत्र और इस सीट से 2017 में चुनाव लड़े तनुज पुनिया, सपा ने गौरव रावत तो बसपा ने अखिलेश अंबेडकर पर दांव लगाया है। हालांकि विपक्षी दलों के अलग-अलग लड़ने से भाजपा को वोटों के ध्रुवीकरण का लाभ मिलता दिख रहा है।

इन सीटों पर भी दिलचस्प मुकाबला
प्रतापगढ़ सीट भाजपा ने अपना दल के लिए छोड़ी है लेकिन प्रत्याशी अपनी पसंद का उतारा है। पूर्व सांसद रत्ना सिंह के भाजपा में शामिल होने से अपना दल को यहां लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। भाजपा को यहां सपा व बसपा से चुनौती मिल रही है। बहराइच की बलहा, चित्रकूट की मानिकपुर और कानपुर की गोविंदनगर सीट पर भी विपक्षी दलों के बीच वोटों के बंटवारे के कारण भाजपा को लाभ मिलता दिख रहा है।  
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