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‘हाथी’ के पैर जमाने को बार-बार बदले ‘महावत’

Thu, 17 Apr 2014 04:44 PM IST
मनोज ओझा/अमर उजाला, लखनऊ
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रायबरेली और अमेठी कांग्रेस की वो सीटें हैं जहां पर जो भी कांग्रेस प्रत्याशी के सामने आया कहीं का नहीं रहा, यहां तक कि बसपा सुप्रीमो कांशीराम भी लड़े लेकिन कांग्रेस के सामने उनकी भी जमानत हो गई जब्त। देखें कब कब इन सीटों पर किसने कांग्रेस को चुनौती देने का प्रयास किया।
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इतिहास गवाह है कि लोकसभा चुनाव में बसपा ने रायबरेली और अमेठी संसदीय सीट पर कभी रिस्क नहीं उठाया। एक प्रत्याशी को एक बार ही आजमाया। सफलता नहीं मिली और जमानत भी चली जाने पर ‘हाथी’ के लिए नए ’महावत‘ को उतार दिया।

रायबरेली और अमेठी में लगातार बसपा के ‘हाथी’ ने कांग्रेस के ‘हाथ’ को कुचलने का प्रयास किया, लेकिन हर बार शिकस्त ही मिली। बसपा सुप्रीमो ने भी अमेठी से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सामने सीधी टक्कर दी, लेकिन उन्हें भी जमानत गंवानी पड़ी।
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बसपा लगातार रायबरेली में सोनिया गांधी और अमेठी में राहुल गांधी को शिकस्त देने के लिए प्रत्याशी उतारकर नए इतिहास का गवाह बनने का प्रयास कर रही है, लेकिन एक के बाद एक प्रत्याशी बदले, पर सफलता नहीं मिली।
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सोनिया को हराने का प्रयास

रायबरेली संसदीय सीट पर पहली बार वर्ष 2004 में सोनिया गांधी चुनाव लड़ने के लिए उतरीं। इस बार सभी राष्ट्रीय पार्टियों ने कड़ा चक्रव्यूह रचकर सफलता पाने का प्रयास किया।

सपा ने अशोक सिंह तो भाजपा ने गिरीश नारायण पांडेय को मैदान में उतारा। वर्ष 1998 में रमेश कुमार को प्रत्याशी बनाने के बाद बसपा ने 2004 में अपना प्रत्याशी बदलकर राजेश यादव को खड़ा कर दिया।

राजेश 57543 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। उनकी जमानत तक जब्त हो गई।

वर्ष 2009 के चुनाव में सोनिया के खिलाफ बसपा ने पूर्व राज्यमंत्री आरएस कुशवाहा को उतारा।

कुशवाहा की भी जमानत जब्त

बसपा को उम्मीद थी कि उसकी मंशा पूरी हो जाएगी, लेकिन जमानत जब्त कराने के साथ ही कुशवाहा दूसरे स्थान पर रहे।

उन्हें मात्र 109325 मत मिले। इससे पहले भी वर्ष 1996 में बसपा ने बाबूलाल लोधी को प्रत्याशी बनाया था। उन्हें 119442 मत मिले थे।

वर्ष 2014 के हो रहे संसदीय चुनाव में बसपा ने ‘हाथी’ के ’महावत‘ को फिर बदल दिया।

बाराबंकी जिले के प्रवेश सिंह को महावत बनाकर कांग्रेस के गढ़ में इतिहास रचने की उम्मीद के साथ भेजा है।
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कांशीराम की भी जमानत जब्‍त

संसदीय क्षेत्र अमेठी में भी बसपा ने बार-बार प्रत्याशी बदलकर भाग्य आजमाया। यहां तो वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में बसपा सुप्रीमो कांशीराम ही मैदान में उतर आए थे।

पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी को हराने का प्रयास किया था, लेकिन 25400 मत पाकर अपनी जमानत तक गंवा ली थी। वर्ष 1996 में मो. ईशा और वर्ष 1998 में मो. नईम को प्रत्याशी बनाया। यह दीगर बात रही कि दोनों को जमानत गंवानी पड़ी।

वर्ष 2004 में राहुल गांधी को हराने के लिए हाथी के नए महावत चंद्र प्रकाश मिश्र मटियारी ने भाग्य आजमाया। सफलता नहीं मिली तो वर्ष 2009 के चुनाव में हाथ को कुचलने के लिए आशीष शुक्ला को उतार दिया।

दोनों के हाथ जीत तो नहीं लगी, लेकिन जमानत जरूर गंवा दी। इस बार भी हाथ को रोकने के बसपा ने डॉ. धर्मेंद्र प्रताप सिंह को नया ’महावत‘ बनाया है।
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